महाकाल का शहर उज्जैन

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उज्जैन का नाम लेते ही महाकाल का नाम मस्तिष्क में कौंध जाता है। वहां की महिमा किससे छिपी हुई है। काल सर्प योग का असर खत्म कराना हो, विशेष पूजा-अर्चना करनी हो या कोई साधना करनी हो, उज्जैन स्थित महाकाल का मंदिर श्रेष्ठ स्थान है।  वैसे तो उज्जैन को मंदिरों का शहर कहा जाता है। महाकाल के मंदिर के साथ ही यहां कई सौ मंदिर हैं। इतिहास में उज्जैन को अवंतिका, अमरावती, सुवर्णगंगा, कुशस्थली, विशाला, उज्जयनी जैसे नामों से जाना जाता था। प्रचीन काल में यहां संदीपनी ऋषि का आश्रम था जहां श्रीकृष्ण की पाठशाला थी। मौर्य सम्राट के शासक अशोक महान के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा की जन्मस्थली है उज्जैन। उज्जैन महाराजा विक्रमादित्य की नगरी है।  राजा विक्रमादित्य के दरबार में नौ रत्न थे। महाकवि कालिदास, वैद्य धन्वंतरि, साहित्यकार अमर सिंह, न्याय दर्शन ज्ञाता क्षपणक, कवि वररुचि, नीति शास्त्री वेताल, गणितज्ञ वराहमिहिर, ज्योतिषी शंकु और विद्वान कवि घटकर्पर नौ रत्नों में शुमार थे। उज्जैन शहर को क्षिप्रा नदी तीन तरफ से घेरती है। शहर में क्षिप्रा नदी के तट मनोरम हैं। यहां हर 12 साल बाद सिंहस्थ कुंभ लगता है। चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन सिंहस्थ कुंभ का स्नान आरंभ होता है।
उज्जैन नगर की आबादी 10 लाख को पार कर चुकी है। अगर उज्जैन शहर के तमाम मंदिरों का दर्शन करना चाहते हैं तो महाकाल मंदिर के पास से उज्जैन दर्शन बस सेवा चलती है। इसके अलावा आप आटो रिक्शा बुक करके भी उज्जैन के प्रमुख मंदिरों का दर्शन कर सकते हैं।
महाकाल मंदिर के ठीक बगल में बड़ा गणेश मंदिर हैं। इससे थोड़ा आगे बढ़ें तो हरसिद्धि माता का मंदिर है। देवी का यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। इसके पास ही चार धाम मंदिर बना है। इसे साध्वी ऋतंभरा के गुरु ने बनवाया है। मंदिर में सुंदर बिजली चलित झांकियां भी हैं। इस मंदिर में भक्तों के लिए रहने की व्यवस्था भी है। ये सभी मंदिर क्षिप्रा तट पर हैं। क्षिप्रा तट पर रामघाट का नजारा मनोरम है। यहां एक संतोषी माता का मंदिर भी है। फिल्म जयसंतोषी मां की शूटिंग इसी मंदिर में हुई थी। शहर से पांच किलोमीटर बाहर चिंतामणि गणेश का मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण परमार राजाओं ने किया था। दूर दूर से लोग इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। कहा जाता है गणेश जी हर तरह की चिंता को हर लेते हैं।
उज्जैन में सवाई जय सिंह द्वारा बनाई गई वेधशाला भी है। मौसम की जानकारी के लिए उन्होंने दिल्ली, जयपुर, मथुरा वाराणसी और उज्जैन में वेधशालाएं बनवाई थीं। इस वेधशाला में सूर्य घड़ी, सम्राट यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दीगांश यंत्र, भित्ति यंत्र और शंकु यंत्र है। भैरव मंदिर की बात करें तो शहर में काल भैरव समेत आठ भैरव मंदिर हैं। यहां भैरव अष्टमी पर मेला लगता है और काल भैरव की सवारी निकाली जाती है।
महाकाल का प्रसाद : उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं के लिए महाकाल मंदिर में भी भोजन की व्यवस्था है। महाकाल का यह प्रसाद 10 रुपये के टोकन पर मिलता है। बड़ा गणेश मंदिर के पास टोकन काउंटर है। उज्जैन से बाहर से आने वाले लोग महाकाल का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। इसमें सुस्वादु भोजन की व्यवस्था है। उज्जैन की सड़कों पर घूमते हुए आप डोसा, इडली और सांची के छाछ का भी स्वाद ले सकते हैं।
नमकीन और सेव का शहर : इंदौर और उज्जैन पोहा के अलावा नमकीन और सेव के लिए जाने जाते हैं। यहां घरेलु उद्योग के तौर पर नमकीन और सेव के सैकड़ो उत्पादक हैं। यहां आपको बीकानेर से अलग नमकीन की सैकड़ो वेराइटी चखने को मिल सकती है। दरें वाजिब और स्वाद जो रहे हमेशा याद। प्लेन सेव के अलावा मसालेदार सेव में लौंग सेव, लहसुन सेव का स्वाद अच्छा है। इसके अलावा खट्टा मीठा की भी दर्जनों वेराइटी आपको उज्जैन के बाजारों में मिल सकती है। अगर आप उज्जैन से जा रहे हैं तो अलग अलग पैकेट के कुछ नमकीन जरूर खरीदें। मालवा क्षेत्र में जब आप कई घरों में खाने जाएंगे तो यहां लोग खाने की थाली में भी सब्जी, रोटी, दाल आदि के साथ नमकीन व सेव भी परोसते हैं।

यहां से लता जी मंगाती हैं अगरबत्ती : उज्जैन शहर बड़े बड़े लोगों को भाता है। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के कई सितारे उज्जैन आते रहते हैं और महाकाल के चरणों में अर्चना करते हैं। सुरों की कोकिला लता मंगेश्कर को भी उज्जैन शहर खास पसंद है। लता मंगेश्कर अपने घर में पूजा पाठ के लिए धूप, दीप, अगरबत्ती और हवन सामग्री उज्जैन से ही मंगाती हैं। महाकाल मंदिर के बगल में बड़ा गणेश मंदिर वाली सड़क है जिस पर एक दुकान है धूप दीप वाली। इस दुकान के बाहर बोर्ड लगा है कि लता जी पूजन सामग्री यहां से मंगाती हैं। धूप का निर्माण उज्जैन की महिला गृह उद्योग समिति कुटीर उद्योग के तौर पर करती है। अपने खास सुगंध के लिए यहां के धूप दीप प्रसिद्ध हैं। दुकान में एक और खास चीज देखने को मिली। छोटा सा बिजली से चलने वाला सुंदर सा टेबल फैन। हमें यह पंखा काफी सुंदर लगा। लेकिन पता चला कि ये पंखा खास तौर घर में बनाए जाने वाले मंदिरों के लिए है। भला जब हमें गरमी लगती है तो भगवान जी को क्यों नहीं लगती होगी। सो ये पंखा भगवान जी को गरमी से निजात दिलाने के लिए बना है। श्रद्धालु खास तौर पर ये पंखा खरीदते हैं और अपने घर में भगवान जी के लिए हवा का प्रबंध करते हैं।

साभार–विद्युत प्रकाश मौर्य

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