मान्यताएं और वैज्ञानिक आधार

347
भारतीय परंपराएं एवं अधिकतर मान्यताएं हमारे ऋषि-मुनियों की देन हैं जिन्होंने काफी शोध के बाद इनकी घोषणा/स्थापना की थी। हालांकि बाद में कुछ पोंगापथियों ने अपने नाम व धंधे को चमकाने के लिए कुछ परंपराओं एवं मान्यताओं से खिलावाड़ कर अर्थ का अनर्थ कर दिया है। परिणामस्वरूप कई लोग उन्हें अंधविश्वास एवं कुरीतियां मानकर सबको सिरे से खारिज करते हैं। ऐसे लोगों के साथ ही इन पर विश्वास करने वाले लोगों के लिए भी यहां मैं कुछ परंपराओं एवं मान्यताओं की चर्चा के साथ ही उनके वैज्ञानिक आधार को भी स्पष्ट कर रहा हूं।
पीपल की पूजा : पीपल के वृक्ष की पूजा का अपने यहां विधान रहा है। विभिन्न अवसरों पर इसकी पूजा की जाती रही है। इसी क्रम में यह अफवाह भी फैल गई कि पीपल की पूजा से भूत-प्रेत भागते हैं। एक लिहाज से देखें तो इसका कारण है। 
वैज्ञानिक तर्क : इसकी पूजा इसलिए की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ऑक्सीजन हमारे लिए बेहद जरूरी है। रात में कार्बन डाइआक्साइड छोड़ने वाले पेड़ों के नीचे रहने से जहां स्वास्थ्य संबंधी समस्या आने का खतरा रहता है जिसे अज्ञानी लोग भूत-प्रेत का प्रकोप मान लेते हैं। वहीं पीपल के पेड़ के नीचे ऑक्सीजन की प्रचूरता से यह समस्य दूर हो जाती है।
तुलसी के पेड़ की पूजा : तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क : तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं। इससे होकर आने वाली हवा में भी औषधीय गुण समाहित हो जाते हैं। इससे उस घर से बीमारी दूर रहती है और सुख-शांति व समृद्धि का प्रभाव बढ़ता है। 
सूर्य नमस्कार : हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परंपपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने वालों पर भगवान सूर्य की कृपा होती है और वह स्वस्थ, निरोग एवं कांतिवान बनता है।
वैज्ञानिक तर्क : सूर्य को जल चढ़ाते समय पानी को पार कर चढ़ाने वाले पर आने वाली सूर्य की रोशनी से शरीर और आंखों को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है। सुबह में सूर्य की रोशनी को कई गुणों से युक्त माना गया है। शरीर की कई खामियां सूर्य की सीधी किरण के दायरे में रहने पर ही दूर हो जाती हैं। चूंकि स्नान के तत्काल बाद जल चढ़ाने की परंपरा है, जो आमतौर पर सुबह ही होता है। अतः जल चढ़ाने के बहाने जब व्यक्ति सूर्य के सीधे संपर्क में आता है तो उसे फायदा पहुंचता है। इस दौरान पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रोशनी और बेहतर होती है।
माथे पर कुमकुम का तिलक : महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। इसे आवश्यक माना जाता है। 
वैज्ञानिक तर्क : आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोशिकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है।
एक गोत्र में शादी अशुभ : भारतीय परंपरा में एक गोत्र में शादी को अशुभ और पूरी तरह से प्रतिबंधित माना जाता है।
वैज्ञानिक तर्क : एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है “सेपरेशन ऑफ़ जींस”.. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और एल्बोनिज्म होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है।
दीपक के ऊपर हाथ घुमाना शुभ : पूजा के बाद दीपक पर हाथ घुमाकर उसे सिर पर लगाने को शुभ और आवश्यक माना जाता है।
वैज्ञानिक तर्क : आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।
मंदिरों की परिक्रमा जरूरी : देव स्थान की परिक्रमा करना जरूरी होता है। इससे देवी-देवता प्रसन्न होते हैं।
वैज्ञानिक तर्क : हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा आठ से नौ बार करनी होती है। कई शोधों में स्पष्ट हुआ है कि मंदिर या किसी भी धार्मिक स्थल पर आमतौर पर काफी सकारात्मक ऊर्जा होती है। अतः जब व्यक्ति धर्मस्थल की परिक्रमा करता है तो सकारात्मक ऊर्जा उसके शरीर में में भी प्रवाहित होने लगती है और शरीर को ताकत के साथ ही मन को शांति मिलती है।
मंदिर में घंटा बजाना : मंदिर में प्रवेश द्वार के समक्ष ही घंटा होता है। श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश से पहले घंटा बजाने को शुभ और आवश्यक माना जाता है। 
वैज्ञानिक तर्क : मंदिर में प्रवेश के दौरान प्रवेश द्वार पर या दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है। यह एक तरह का शारीरिक और मानसिक उपचार है जो हमारे तंतुओं को जागृत एवं सक्रिय करता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here