प्रकृति का आकर्षण का नियम: जो दोगे, वही मिलेगा

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सृष्टि का नियम साफ कहता है कि आपको जो देंगे, वही वापस मिलेगा। मनुष्य ही नहीं पूरा ब्रह्मांड एक चुंबक की तरह है जो विचार और भावनाओं को ग्रहण करता है और कार्यकारिणी नियम के तहत उसी हिसाब से प्रतिक्रिया देता जिस हिसाब से उसे मिलता है। इस नियम के तहत किसी व्यक्ति के धन-दौलत, शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, व्यवसाय, संबंध आदि का आधार बनाता और बिगाड़ता है। हमारे ऋषि-मुनि इस नियम से न सिर्फ भली-भांति परिचित थे, बल्कि इसका उपयोग करना भी जानते थे। आप वेद का अध्ययन करें तो पाएंगे कि चाहे कितनी भी प्रतिकूल स्थिति हो मंत्रकर्ता ऋषि सकारात्मकता से भरपूर देवताओं की इस विश्वास से स्तुति करते थे कि उन्हें देवता की कृपा अवश्य मिलेगी। परिणामस्वरूप प्रकृति रूपी देवता भी उन्हें मनोवांछित फल देकर निहाल कर देते थे।


अब आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत को उस कसौटी को कस कर देखें। इसके लिए सबसे पहले आप ऐसे व्यक्ति को तलाश करें जो अपनी वर्तमान नौकरी से खुश नहीं है। अर्थात उसका अपनी नौकरी के प्रति नकारात्मक भाव है। आप पाएंगे कि इस नियम के अनुसार निश्चय ही ऐसे व्यक्ति को नकारात्मक परिणाम के रूप में नौकरी में और अधिक अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ रहा होगा। इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि जो विद्यार्थी अपने विषय से प्रेम नहीं कर पाते, वह बोझ समझ कर पढ़ाई को निपटाते हैं। परिणामस्वरूप उनका परिणाम भी निपटाने वाला ही होता है। विषय से प्रेम कर उसमें डूब कर पढ़ने वाले विद्यार्थी को शानदार परिणाम मिलता है और वह ऊंचाई को छूता है। यही स्थिति जीवन के हर क्षेत्र में होती है। आकर्षण का नियम किसी भी विचार व भाव को उतनी ही सटीकता व स्पष्टता से लौटाता है जितनी सटीकता व स्पष्टता से वह उसके (प्रकृति) पास पहुंचता है। इस तरह से आप खुद अपने लिये अच्छी या बुरी स्थिति का निर्माण करते हैं।


अब जरा पौराणिक कथाओं का अवलोकन करें। प्रख्यात मतंग मुनि के बारे में यह कथा प्रचलित है। कम समय में ही मतंग अपने उल्लेखनीय कार्यों व उपलब्धियों से प्रसिद्ध हो गए थे। उनका मानव तो क्या पशु-पक्षी, जीव-जंतु यहां तक कि प्रकृति के कण-कण से प्रेम करने की चर्चा चारों ओर फैलने लगी थी। उनका विचार और प्रभाव दिनों-दिन फैलने लगा था। कहते हैं कि उनकी क्षमता और पशु-पक्षियों के साथ उनका स्नेह देखकर ईश्वर भी उनका सम्मान करते थे। उनका इशारा मिलते ही पक्षियां उड़ कर मतंग ऋषि के कंधों पर बैठ जाते थे।


उनकी ख्याति सुनकर कुछ ऋषियों ने उन्हें देखने और परखने की ठानी। ऋषियों का दल मतंग की कुटिया के सामने पहुंच गया। उन्होंने देखा कि मतंग पूरे मनोयोग से कुछ पक्षियों के साथ खेल रहे हैं, उन्हें दुलार रहे हैं। इस क्रम में वे इतने डूबे हुए थे कि उन्हें आसपास का भी भान नहीं था। ऋषियों के दल की जिज्ञासा बढ़ी। वे मतंग मुनि के पास आए और बोले, आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी आप इन पक्षियों के साथ खेलकर समय व्यर्थ कर रहे रहे हैं। इससे आपका बहुमूल्य समय जो किसी अन्य महत्वपूर्ण कार्य में लगना चाहिए था, नष्ट नहीं होता? सवाल सुन कर मतंग मुनि मंद-मंद मुस्कुराने लगे। अचानक उन्होंने अपने एक शिष्य को बुला कर कहा कि धनुष लेकर आओ। धनुष आया तो मतंग ने उस पर डोरी चढ़ाने के बाद डोरी फिर ढीली करके रख दी। ऋषियों को अपने सवाल के जवाब में मतंग की यह हरकत समझ में नहीं आई। वे ऋषियों के लिए अबूझ पहेली बन चुके थे।


आश्चर्य में डूबे ऋषियों के दल ने मतंग मुनि से पूछा कि आपने हमारे सवाल के जवाब में धनुष की डोरी चढ़ाकर फिर ढीला छोड़ कर क्या संदेश दिया है? मतंग मुनि ने कहा कि दरअसल, हमारा मन धनुष की तरह है। जिस तरह से धनुष की डोरी बीच-बीच में उपयोग न करने से टूट सकती है, ठीक उसी तरह काम न करने से हमारा मन बेकार हो जाता है। पशु-पक्षियों के साथ खेलना और उन्हें डूब कर प्यार करना भी एक तरह से काम है। मन को इससे खुराक मिलती है और उसमें एकाग्रता आती है। दरअसल, हम सभी यह जानते हैं कि काम नहीं होने से मन चंचल हो जाता है और इसी दौरान हम गलती कर बैठते हैं। इसलिए मन को बांधने, एकाग्रचित्त करने और शांत करने के लिए हमें हमेशा किसी न किसी रूप में कर्म में लीन रहना चाहिए, क्योंकि इससे मन में हमेशा स्फूर्ति बनी रहती है। चूंकि प्रेम देना और लेना मन-मस्तिष्क के लिए सबसे अच्छा काम है, इसलिए जैसे ही मुझे समय मिलता है, मैं पक्षियों के साथ प्रेम में लीन हो जाता हूं। इसके माध्यम से मेरा प्रकृति से सीधा संपर्क हो जाता है। उनका जवाब सुनकर ऋषियों का दल उनके समक्ष नतमस्तक हो गया और कहा, अब हम यह समझ गए कि आपने इतने कम समय में इतनी सफलता कैसे प्राप्त की? इसका मतलब यही है कि कर्म ही धर्म है और प्रेम उसकी पराकाष्ठा।



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