आस्था का केंद्र बाबा बालकनाथ, करते हैं भक्तों की हर मनोकामना पूरी

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देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कण-कण में सचमुच देवताओं का वास है। वहां की धरती पर पहुंचते ही मन में एक अद्भुत और अलौकिक भाव जन्म लेता है। जगह-जगह स्थित देवी-देवताओं के सैकड़ों मंदिर न सिर्फ भक्तों की आस्था के बड़े केंद्र हैं, बल्कि वहां लोगों की मनोकामना भी पूरी होती है। ऐसे ही मंदिरों में एक प्रमुख मंदिर है हमीरपुर जिले में स्थित बाबा बालकनाथ का। दूसरे प्रदेशों से जाने वाले लोगों को यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से लंबा सफर तय करना पड़ता है। आप निजी वाहन से जाएं या सार्वजनिक वाहन से, वहां पहुंचते-पहुंचते थक अवश्य जाएंगे। लेकिन हैरत की बात है कि मंदिर परिसर में पहुंचकर सारी थकावट छूमंतर हो जाती है और मन उल्लास और आस्था से भर उठता है। आपको वहां पहुंचने वाले भक्तों में कई दूसरे प्रदेश के एक भक्त मिल जाएंगे जो सालों से बिना नागा प्रतिमाह बाबा बालकनाथ के दर्शन करने आते हैं। उनमें कई लोग वहां आना शुरू करने के बाद अपने जीवन में आए चमत्कारिक बदलाव का अनुभव भी बताते मिलेंगे।


हिमाचल पहुंचने वालों को बाबा बालकनाथ तक पहुंचने के लिए किसी की मदद की जरूरत नहीं है। सार्वजनिक परिवहन सेवा की बसों के साथ ही निजी वाहन वाले भी बाबा बालकनाथ के बारे में पूछते ही पूरी जानकारी दे देते हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए प्रशासन ने यहां हर संभव प्रयास किए हैं। यही नहीं, प्रशासन ने बाहर से आए श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह साइन बोर्ड लगाए हैं। यहां दो वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले बाबा जी के मंदिर के पास ही तीन किलोमीटर दक्षिण में बच्छरैट महादेव मंदिर भी स्थित है। 770 ई. पूर्व में इसे राजा वीर चंद ने बनवाया था। कहा जाता है शाहतलाई और इस मंदिर के दर्शन भी बाबा बालक नाथ जी के दर्शनों के साथ ही किए जाना शुभ होता है। माता रतनो के घर में बाबा बालक नाथ का साधारण ग्वाले के रूप में रहना और फिर रतनो द्वारा तानों जैसे संवाद सुनकर बाबा जी द्वारा ‘ले माई अपने बारह बरसों की रोटियां और लस्सी’ दिखाना अभी भी शाहतलाई मंदिर में एक सच्ची और अद्भुत कहानी बयान करता है।


मंदिर में पुरुषों और महिलाओं के लिए दर्शन की अलग-अलग व्यवस्था है। मुख्य मंदिर में महिलाओं को बाबा के बिल्कुल पास जाने पर रोक है। उनके लिए थोड़ा हटकर ऊंचाई पर दर्शन की व्यवस्था की गई है। बाबा बालक नाथ जी शिव जी के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय के अवतार माने जाते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि बाबा बालकनाथ ने इस क्षेत्र में भी काफी समय बालक के रूप में व्यतीत किया है। उनकी महिमा व चमत्कार के किस्से यहां काफी चर्चित हैं। यहां एक बार भी आने वाले अधिकतर श्रद्धालु बार-बार आना चाहते हैं जो इस क्षेत्र की महत्ता को बताने के लिए काफी है।


बाबा बालकनाथ को प्रसाद के रूप में रोट चढ़ाया जाता है। श्रद्धालुओं को यह मंदिर परिसर में ही मंदिर कमेटी की ओर से उचित मूल्य पर मिल जाता है। बाबा के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर की ओर से बाबा के प्रसाद के रूप में थोड़ा-थोड़ा भस्म दिया जाता है जो वहां नियमित होने वाले हवन से निकलता है। यह भस्म अत्यंत कल्याणकारी होता है। इसे सर पर लगाने मात्र से ही रोग, शोक, टोना, तांत्रिक क्रियाओं आदि में तत्काल आराम मिलता है। लोगों का विश्वास है कि बाबा यहां दर्शन करने आने वालों की मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं। मनमोहक प्राकृतिक वातावरण वाले इस मंदिर व उसके आसपास में आप चाहे जितनी देर रहें मन नहीं भरता है। मंदिर परिसर भी साफ-सुथरा और व्यवस्थित है।


इस सिद्धपीठ में आने के लिए यूं तो साल भर का समय अनुकूल है लेकिन चैत्र मास में बाबा बालक नाथ जी के मेलों का आयोजन होने से यह समय श्रद्धालुओं के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान बाबा के दर्शन व पूजन से अधिक शीघ्रता से फल मिलता है। इस दौरान आसपास का माहौल भी भक्ति व उल्लास से भरा लगता है। 14 मार्च से 30 अप्रैल तक मनाए जाने वाले इस मेले में देश ही नहीं बल्कि विश्व भर से श्रद्धालु यहां आना अपना भाग्य समझते हैं। असंख्य आस्था रखने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर यहां आकर अपनी इच्छा से चढ़ावा चढ़ाकर बाबा जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। सुबह-सवेरे से ही पंक्तियों में खड़े रहकर दर्शन करने का आनंद सच में किस्मत वालों को ही नसीब होता है ऐसी मान्यता है। ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों, ऊंची, लंबी और बड़ी-बड़ी ध्वजाओं, पताकाओं के साथ श्रद्धालु गाते-बजाते मंदिर की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। सारा वातावरण ही भक्तिमय होता है, जब कोई घुटनों के बल तो कोई लेटे-लेटे ही घिसटते हुए मंदिर परिसर तक पहुंचते हैं। ऐसे दृश्य देखकर वास्तव में बाबा जी के प्रति आस्था और विश्वास का पैमाना तय कर पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी लगता है। 



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