ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन

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ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन
ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन।

Understand the imbalance of planets and elements like this : ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों का असंतुलन। इसमें ग्रहों के साथ शरीर में उससे संबंधित कफ, पित्त और वायु के प्रभाव की जानकारी दी जाएगी। पहले जानें कि कफ, पित्त और वायु का अर्थ और ग्रहों व पंच तत्वों से संबंध। शुरुआत कफ से। कफ में पानी और पृथ्वी के तत्व होते हैं। वात का अर्थ हवा होता है और इसमें आकाश और वायु के तत्व होते हैं। पित्त में अग्नि और पानी के तत्व होते हैं। प्रत्येक दोष के अपने प्राकृतिक गुण भी होते हैं। आयुर्वेद में ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो प्रत्येक दोष-गुण से जुड़े हैं। ये पदार्थ हैं-मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कसैला प्रभाव वाले। इनके समन्वय से भी तत्वों के साथ ही कफ, पित्त और वायु को संतुलित करना संभव है। भोजन में वस्तुओं के उचित समन्वय से भी तत्वों का संतुलन संभव है।

पृथ्वी व जल तत्व से बने मीठे को ग्रहों से करें संतुलित

मीठा स्वाद पृथ्वी और पानी का योग है। पृथ्वी के कारक ग्रह बुध हैं। जल का प्रतिनिधित्व शुक्र और चंद्रमा करते हैं। यह कफ को बढ़ाता है और वात और पित्त को कम करता है। इसके असंतुलन से भारीपन, ठंड, मोटापा, अधिक नींद, भूख न लगना, मधुमेह, मांसपेशियों की असामान्य वृद्धि का खतरा रहता है। पृथ्वी व जल तत्व को रंग, मुद्रा या मंत्र से संतुलित कर सकते हैं। इसे बुध, चंद्र और शुक्र को अनुकूल कर भी मनोवांछित लक्ष्य पा सकते हैं। इसके संतुलन से त्वचा और बालों की स्थिति भी सुधरती है। यह टूटी हड्डियों को ठीक करता है और उसका विकास करता है। ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों को में अब पढ़ें खट्टा और नमकीन स्वाद, प्रभाव और उसे संतुलित करने के बारे में।

पृथ्वी-अग्नि से खट्टा और जल अग्नि से नमकीन

खट्टा स्वाद पृथ्वी और अग्नि का योग है। पृथ्वी बुध है और अग्नि सूर्य और मंगल है। यह पित्त और कफ को बढ़ाता है। ऐसा होने पर वात में कमी आती है। इससे होने वाले विकार रक्त की विषाक्तता, अल्सर, दांतों की संवेदनशीलता, जलन, एसिडिटी, कमजोरी और बढ़ी हुई प्यास के रूप में सामने आते हैं। यह भूख को बढ़ाता है। दिमाग और इंद्रियों को तेज करता है। इसका संतुलन दिल और पाचन तंत्र के लिए अच्छा होता है। नमकीन स्वाद जल और अग्नि का संयोजन है। जल चंद्रमा और शुक्र तथा अग्नि सूर्य और मंगल है। यह पित्त और कफ को बढ़ाता है और वात को कम करता है। इसमें विकार हो तो शरीर की पाचन प्रणाली कमजोर होती है। त्वचा रोग होता है। साथ ही अचानक बेहोशी का खतरा रहता है। झुर्रियां, बालों का झड़ना, रक्त विकार, पेप्टिक अल्सर, चकते और फुंसियों के लिए भी जिम्मेदार है।

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तीखा से अग्नि-वायु व कड़वा से संतुलित करें वायु व आकाश

अग्नि और वायु का योग है तीखा स्वाद। अग्नि मतलब सूर्य और मंगल तथा वायु शनि है। यह वात और पित्त को बढ़ाता है। इससे कफ घटता है। बहुत अधिक तीखा शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है। यह पसीना पैदा करने के साथ कमजोरी भी देता है। भोजन के स्वाद को बेहतर बनाने के साथ भूख व पाचन शक्ति को बढ़ाता है। यह रक्त को साफ कर संचार में सुधार करता है। विषाक्त पदार्थों को समाप्त करता है। यह कफ से होने वाले विकारों को ठीक करता है। कड़वा स्वाद वायु और आकाश का संयोजन है। अर्थात शनि व गुरु ग्रह हैं। यह वात बढ़ाकर पित्त और कफ घटाता है। इसमें विकार से निर्जलीकरण व त्वचा में खुरदरापन संभव है। यह वीर्य, अस्थि व मज्जा में समस्या पैदा करता है। इसे संतुलित कर शरीर और मन के असंतुलन को दूर किया जा सकता है। यह एंटी-टॉक्सिक और कीटाणुनाशक है।

वायु व पृथ्वी का मिश्रण है कसैला, इसे शनि व बुध से साधें

ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों के असंतुलन में अब जानें कसैला स्वाद के बारे में। यह वायु और पृथ्वी तत्व का मिश्रण है। वायु के कारक ग्रह शनि और पृथ्वी के बुध हैं। इसके बढ़ने से वात बढ़ता है और पित्त और कफ घटता है। कसैलेपन की अधिकता से कमजोरी और समय से पहले बुढ़ापा, कब्ज और गैस का प्रतिधारण होता है। यह पक्षाघात और ऐंठन को बढ़ावा देता है। यह हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। रक्त के जमने का भी कारण बनता है। यह अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने में मदद करता है और पसीना और रक्त प्रवाह को कम करता है। नीचे अग्नि, वायु और आकाश तत्व के साथ ही ग्रहों और उनसे जुड़ी वनस्पतियों व राशियों की जानकारी दूंगा। अपनी समस्या के अनुसार उनके भी उचित समन्वय मनोवांछित लाभ पा सकते हैं।

जानें अग्नि, वायु और आकाश के पदार्थ व प्रभाव को

अग्नि का अपना कोई पदार्थ नहीं है लेकिन यह किसी भी पदार्थ की स्थिति को बदल सकती है। अग्नि ही भोजन को वसा में बदलती है। यह ऊर्जा हमारे आवेगों, विचार प्रक्रिया और तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करती है। वायु का अर्थ ही है गैसीय रूप। यह हमेशा गतिशील रहती है। अग्नि को जलने के लिए इसका होना आवश्यक है। इसके बिना जीवन भी संभव नहीं है। ऊर्जा का हस्तांतरण इसी के माध्यम से होता है। आकाश किसी भी दो तत्वों के बीच शून्य को भरता है। इसका सीधा कोई कार्य नहीं दिखता है। यह सभी तत्वों को कार्य करने में मदद करता है। इसके बिना अन्य तत्व नहीं रह सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो आकाश अन्य तत्वों को व्यक्तित्व प्रदान करता है। आकाश का कार्य ध्वनि है।

कफ, पित्त, वायु और तत्वों से जुड़े ग्रह, राशियां व वनस्पति

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि और राहु वात से जुड़े हैं। इनकी राशियां वृष, कन्या और मकर हैं। सूर्य, मंगल और केतु पित्तकारक हैं। इनकी राशियां हैं- मेष, सिंह और धनु। चंद्रमा, शुक्र और गुरु कफकारक हैं। इनकी राशियां– कर्क, वृश्चिक और मीन हैं। बुध तीनों के कारक ग्रह हैं। इनसे जुड़ी राशियां– मिथुन, तुला और कुंभ हैं। ऐसे समझें ग्रहों और तत्वों को में अब पंच तत्वों और ग्रहों के वनस्पति से संबंध को भी जानें। अग्नि तत्व से संबंधित सूर्य की वनस्पति बेल है। जल तत्व से संबंधित चंद्रमा की वनस्पति खिरनी है। अग्नि तत्व के कारक ग्रह मंगल की वनस्पति भी बेल के साथ अनंतमूल है। पृथ्वी तत्व से संबंधित बुध की वनस्पति विधारा है। आकाश तत्व के कारक गुरु की वनस्पति केला है। जल तत्व से संबंधित शुक्र की वनस्पति सरफोंखा और वायु तत्व से संबंधित शनि की वनस्पति बिच्छू है।

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