बोध कथा : उतावले न बनें, भगवान सबकी सुनते हैं

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हम जरूरत होने पर भगवान की प्रार्थना करते हैं और तत्काल फल न मिलने पर निराश होकर बैठ जाते हैं और उनको दोष देने लगते हैं कि वह हमारी सुनते ही नहीं। कुछ लोग तो यहां तक कहने लगते हैं कि भगवान हैं ही नहीं। यह उतावलापन ठीक नहीं है। भगवान की प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है, लेकिन हमारी सोच के अनुरूप नहीं। भगवान खुद सब देखते और महसूस करते हैं, जहां उन्हें जरूरत लगती है, पहुंच जाते हैं या मदद करते हैं। उनकी मदद परिस्थिति के अनुरूप होती है। वह निरंतर हमारा कल्याण करना चाहते हैं। सीमित बुद्धि के कारण हम उनके न्याय और प्रेम को समझ नहीं पाते। हमेशा याद रखें कि हम भगवान से जितना प्यार करते हैं, परमपिता होने के कारण वह हमसे उससे ज्यादा प्यार करते हैं। बदले में हमें सिर्फ उन्हें प्यार देने (भक्ति करने) और विश्वास करने की आवश्यकता है। प्रस्तुत बोध कथा में यही संदेश स्पष्ट होता है।


डा. मार्क एक प्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञ थे। एक बार किसी सम्मेलन में भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे। वहां उनको उनकी नई मेडिकल रिसर्च के महान कार्य के लिए पुरुस्कृत किया जाना था। वे बड़े उत्साहित थे और जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी। बड़ा उतावलापन था, उनका उस पुरस्कार को पाने के लिए।


उड़ान भरने के लगभग दो घंटे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। उन्होंने पूछताछ की तो पता चला कि अगली प्लाईट दस घंटे बाद है। डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे, इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से अपने गंतव्य शहर के सड़क मार्ग की जानकारी ली और सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए एक टैक्सी के लिए पूछा। दुर्भाग्य से एक जान-पहचान वाले के माध्यम से कार तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना। इसलिए उन्होंने खुद ही कार चलाने का निर्णय लिया। जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज आंधी-तूफान शुरु हो गया। रास्ता दिखना लगभग बंद सा हो गया। नया रास्ता और ऊपर से बेहद खराब मौसम की इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए। लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं।


थक तो वे गए ही थे, भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे। कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ीनुमा मकान दिखा। मकान के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी। परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया। एक महिला ने दरवाज़ा खोला। डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन काल करने की इजाजत मांगी। उस महिला ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है। फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए। मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर, आगे चले जाइएगा। भूखे, भीगे और थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी। उस महिला ने उन्हें बड़े सम्मान से बिठाया और चाय व कुछ खाने को दिया। साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें और उनका धन्यवाद कर दें।”


डाक्टर उस महिला की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले, “मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता। मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं। आप अपनी प्रार्थना कर लें।” टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस महिला को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ बड़े तन्मयता से ईश्वर की प्रार्थना कर रही थी। उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो, इस स्त्री को कुछ समस्या है। जैसे ही वह महिला अपने पूजा के स्थान से उठी, तो डाक्टर ने पूछा, “आप बहुत परेशान प्रतीत होती हैं। आपको भगवान से क्या चाहिेए? क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”


उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा, “ये मेरा पुत्र है और इसको एक गंभीर रोग है जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के ही पास है परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं उन तक, बहुत दूर स्थित उनके शहर जाकर उनका महंगा इलाज करा सकूं। ऐसे में मेरे पास सिर्फ भगवान का ही सहारा है। यह सच है कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है कि वह बहुत कृपालु हैं और एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे। वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे। वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।”


डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए। वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए। आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले, “सचमुच भगवान बहुत महान और कृपालु हैं।” उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा कि कैसे उन्हें सम्मेलन में जाने की जल्दी थी। कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी और तत्काल वैकल्पिक जहाज का इंतजाम नहीं हो सका। कैसे कार के लिए भी उन्हें ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए। वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस भक्त महिला की प्रार्थना का उत्तर देना था बल्कि भगवान उन्हें इभी एक मौका देना चाहते थे कि वे भौतिक जीवन में धन, प्रतिष्ठा आदि कमाने से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें। वे समझ गए की भगवान चाहते हैं कि वह उन लोगों का इलाज करें जिनके पास धन तो नहीं है किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।



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