प्रकृति की शक्ति और उसके दोहन के तरीके (भाग-2)

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Result of karma

जीवन के प्रिप्रेक्ष्य में यह सिद्धांत सचमुच बेहद महत्वपूर्ण है- प्रत्येक क्रिया की समान और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। आइजैक न्यूटन (1643-1727), गणितज्ञ और भौतिकशास्त्री न्यूटन का यह सिद्धांत सिर्फ विज्ञान ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में समान महत्व रखता है। ब्रह्मांड की हर गतिविधि इससे ही संचालित होती है। मानव की सोच और क्रियाएं भी इससे बाहर नहीं है। हम जैसा सोचते हैं, क्रिया करते हैं, उसकी उसी तरह से समान प्रतिक्रिया होती है और हमें तदनुसार फल मिलता है। आज भी गांवों में बड़े-बुजुर्ग किसी कड़वे व बुरे बोल पर तत्काल टोकते हैं कि शुभ बोलो। यही जीवन का मूल मंत्र भी है। लोगों के विचार और कर्म ही उनके जीवन का संचालन और निर्धारण करता है। यह अलग बात है कि जिन विचारों एवं कर्मों में तीव्रता की कमी होती है, उसका असर न्यूटन के बताए नियम के अनुसार उतना ही हल्का होता है। जीवन का यह मंत्र बिल्कुल सहज और सरल है। इसके साथ ही हमारा समय, आर्थिक-सामाजिक स्थिति, संबंध, कामधंधा आदि कैसा रहेगा, यह हम पर ही निर्भर करता है।


मानव जीवन का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जीवन में दो तरह की ही चीजें होती हैं- सकारात्मक और नकारात्मक। चाहे आर्थिक स्थिति हो, स्वास्थ्य, कामधंधा या संबंध हो- या तो सकारात्मक होते हैं या नकारात्मक। मतलब कि या तो किसी की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है या बुरी। कामधंधा अच्छा चलता है या बुरा। लोग स्वस्थ रहते हैं या अस्वस्थ। समय अच्छा लगता है या बुरा। यदि आपके जीवन में बुरा ज्यादा हो रहा है तो मतलब साफ है कि कहीं न कहीं आपकी जीवनधारा में गड़बड़ी है। आपकी सोच में नकारात्मकता हावी है। विश्वास रखें कि प्रकृति कभी किसी का बुरा नहीं चाहती है। उसकी व्यवस्था सबको सुखी और आनंद से परिपूर्ण रखने की है। इसके लिए शर्त सिर्फ इतनी है कि हमारी सोच सकारात्मक हो। अपने आसपास सफल और सुखद जीवन जीने वाले लोगों के रुख को देखें तो पाएंगे कि सफल क्षेत्र के प्रति उनका रुख बेहद सकारात्मक होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह अपनी सफलता एवं उससे जुड़ी चीजों से जाने-अनजाने प्रेम करते हैं। जैसे किसी के पास यदि बहुत धन आता है तो वह निश्चय ही धन से प्यार करता है। दूसरी ओर पैसों की तंगी झेलने वाले लोग उसकी जरूरत तो महसूस करते हैं लेकिन साथ ही साथ धन एवं धनवान लोगों को पाप का द्वार और अनुचित साधन का प्रयोग करने वाले मानते हैं। अधिकांश लोगों को बचपन से ही शिक्षा दी जाती है कि अधिक धन अनुचित साधन से ही कमाया जा सकता है। पैसे भले कम मिलें लेकिन ईमानदार रहना ज्यादा जरूरी है। इस तरह जहां वह धन के प्रति घृणा के भाव से भर जाते हैं, वहीं, उनमें उसके प्रति नकारात्मकता भी बढ़ती जाती है। वह भले पैसे की कमी महसूस करते हों और उसे पाना चाहते हों, लेकिन उससे प्रेम नहीं कर पाते हैं।


गौतम बुद्ध (536-483 ई.पू.) ने कहा था– यदि कोई व्यक्ति किसी बुरे विचार के साथ बोलता या काम करता है, तो दुख उसका पीछा करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अच्छे विचार के साथ बोलता है या काम करता है तो खुशी उसके पीछे आती है- उस छाया की तरह, जो उसे कभी नहीं छोड़़ती।


दुनिया महानतम चिंतकों एवं विचारकों ने प्रेम को सर्वाधिक महत्व दिया है। उन्होंने प्रेम की सामान्य व्याख्या से परे, सकारात्मक शक्ति के स्रोत के रूप में रेखांकित किया है। सच भी यही है कि प्रेम ही सकारात्मकता और हर अच्छी वस्तु का मूल आधार (कारण) है। महात्मा बुद्ध के उक्त कथन का विश्लेषण करें और अपने आसपास के लोगों के जीवन पर नजर डालें तो पाएंगे कि किसी चीज की कमी महसूस करना और उस चीज से प्यार करना दो बिल्कुल अलग बात है। उदाहरण के लिए कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाता है तो वह बीमारी से त्रस्त और स्वास्थ जीवन की कमी महसूस करता है। परिणामस्वरूप वह अनचाहे रूप में और अधिक बीमारी को आमंत्रित कर रहा होता है। कुछ लोग बीमारी के दौरान भी सकारात्मक सोच के साथ शीघ्र स्वस्थ होने के भाव के साथ ईश्वर का धन्यवाद देते रहते हैं। वे बीमारी की चर्चा न के बराबर करते हैं, देखेंगे कि ऐसे लोग जल्दी स्वास्थ लाभ करते हैं।


पाश्चात्य चिकित्सा के जनक हिप्पोक्रेट्स (लगभग 460 ई.पू.- 370 लगभग ई.पू.) के अनुसार हमारे भीतर की प्राकृतिक शक्तियां ही रोग की सच्ची उपचारक हैं।



(जारी)

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