शिव तांडव स्तोत्र से करें मनोकामना कामना की पूर्ति

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भगवान शिव का तीन अंक से संबंध का रहस्य
भगवान शिव का तीन अंक से संबंध का रहस्य।

Shiva tandava stotra for fulfilment of wishes : शिव तांडव स्तोत्र से करें मनोकामना कामना की पूर्ति। यह महादेव के सर्वाधिक प्रिय स्तोत्रों में से एक है। रावण रचित यह स्तोत्र अद्भुत है। इसके पाठ से ही हर तरह का लक्ष्य पाया जा सकता है। धन-संपत्ति प्राप्ति में बेजोड़ है। इससे व्यक्तित्व निखरता है। इसके नियमित पाठ से वाक सिद्धि होती है। यदि आप बोलते हुए अटकते हैं तो यह समस्या इस स्तोत्र के पाठ से दूर हो जाएगी। इसकी शब्द रचना के कारण उच्चारण साफ हो जाता है। इससे नृत्य, लेखन, युद्धकला, ध्यान आदि में भी मदद मिलती है। इसके रोज पाठ करने वाले को राजसी वैभव और अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

इस तरह हुई शिव तांडव स्तोत्र की रचना

इस स्तोत्र के बारे में एक कथा है। इसके अनुसार एक बार रावण पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी कैलाश पर उसकी नजर पड़ी। वह उस ओर बढ़ चला। नंदी ने उसे टोका। कहा- इस क्षेत्र को कोई पार नहीं कर सकता। यह शिव का क्षेत्र है। यह सुनते ही दशानन क्रोधित हो गया। उसने कहा कि मैं इस पर्वत का नामो-निशान मिटा दूंगा। इसके बाद उसने कैलाश को उठा लिया। इससे भगवान शिव का ध्यान टूट गया। उन्होंने अपने बाएं पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया। दशानन उस पर्वत के नीचे दब गया। उसका अहंकार टूट चुका था। तब उसने शिव की प्रार्थना प्रारंभ की। उसी अवस्था में उसने इसके लिए एक स्तोत्र की रचना की। उसी का नाम शिव तांडव स्तोत्र है। इससे भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका नाम रावण रखा। रावण का अर्थ भीषण चीत्कार करने वाला होता है।

जानें क्या है शिव तांडव स्तोत्र

शिव तांडव स्तोत्र से हर मनोकामना पूरी होती है। यह रावण की विद्वता का अनुपम उदाहरण है। आइए, जानें क्या है यह स्तोत्र, इसके पाठ की विधि और फल। नीचे तीन भाग में बंटे स्तोत्र को मिलाकर पाठ करना है। विधि व फल के लिए बीच में अन्य बातें दी हैं।

जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।

डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु न: शिव: शिवम।

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं ममं।

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि।

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनि:

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्।

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू न:।

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम।

शिव तांडव स्तोत्र से लाएं जीवन में बदलाव

इस स्तोत्र का भक्तिभाव से पाठ करना चाहिए। कोशिश हो कि पाठ का समय व स्थान में बदलाव नहीं हो। पाठ से पहले स्नान करना चाहिए। साथ ही उचित होगा कि शिव का पूजन भी पहले किया जाए। नीचे के भाग को ऊपर के साथ मिलाकर पाठ करें।

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतम: प्रबंधबंधुकंधर: ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुर:

कलानिधानबंधुर: श्रियं जगंद्धुरंधर:।

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे।

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डव: शिव:।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयो: सुहृद्विपक्षपक्षयो: ।

तृणारविंदचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो:

समं प्रवर्तयन्मन: कदा सदाशिवं भजे।

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्

विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमंजलिं वहन्।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नक:

शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्।

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहर: ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चय:।

रोज करें पाठ, मनवांछित फल मिलेगा

ऊपर के दोंनों भाग के साथ नीचे वाले को मिला लें। फिर एक साथ पाठ करें। पूरा मिलाकर एक स्तोत्र है।

प्रचंड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनि:

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

य: शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भु:।

स्तोत्र में ही इसके फल की जानकारी दी गई है। इसका रोज पाठ करने वाले का परिवार परिपूर्ण रहता है। मृत्यु के बाद शिवलोक में वास करता है। प्रदोष काल में पाठ करने पर लक्ष्मी स्थिर होती है। वह सुख-संपत्ति से पूर्ण होता है। शिव पूजा करने पर अंत में अवश्य पाठ करें। यह अत्यंत फलदायी है।

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