बात खतरनाक लेकिन सत्य…यह कैसा धर्म और कैसी श्रद्धा

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The message of love and brotherhood given to everyo

बात खतरनाक लेकिन सत्य है। लोग धर्म, आध्यात्म और श्रद्धा की व्याख्या अपने-अपने तरीके और सुविधा के अनुसार करते हैं और यही सभी समस्याओं का मूल कारण है। सच यह है कि धर्म शाश्वत, पूर्ण सत्य और और किसी भी व्याख्या से परे है जो उसे उसी रूप में स्वीकार करता है, उसके लिए कोई समस्या या परेशानी नहीं है। आइए इसे एक उदाहरण से देखते और समझते हैं।


मान लीजिए कि आप किसी रास्ते पर पैदल चले जा रहे हैं। तभी अचानक आपको वहां पड़ी हुई पत्थर की दो अत्यंत सुंदर मूर्तियां नजर आती हैं। एक मूर्ति भगवान राम की और दूसरी रावण की हैं। अब आपको कहा जाता है कि आप इनमें से एक मूर्ति उठा कर अपने साथ घर ले जा सकते हैं। आप क्या करेंगे? अवश्य आप राम की मूर्ति उठा कर घर ले जाएंगे। क्यों? क्यों की राम सत्य, निष्ठा, सकारात्मकता  और ऊर्जा के प्रतीक हैं। दूसरी ओर रावण नकारात्मकता और बुराई का प्रतीक है।


पुनः नए सिरे से कल्पना कीजिए कि फिर से आप रास्ते पर पैदल चल रहे हैं और फिर राम और रावण की ही मूर्तियां सड़क पर पड़ी मिलें। लेकिन इस बार राम की मूर्ति पत्थर की और रावण की मूर्ति सोने की है। अब आपको फिर एक ही मूर्ति उठाकर घर ले जाने की इजाजत है। अब आप क्या करेंगे? जाहिर है कि आप राम की मूर्ति छोड़ कर  रावण की सोने की मूर्ति उठाएंगे। अधिकतर लोग यही करेंगे।


इसका मतलब हुआ? हम सत्य और असत्य के साथ ही सकारात्मक और नकारात्मक, अच्छाई और बुराई का चयन और व्याख्या अपनी तात्कालिक सोच एवं सुविधा के अनुसार करते हैं। उसमें भी हम अपना लाभ खोजते और तय करते हैं। मंदिर भी जाते हैं तो सौदेबाजी करते हैं। भगवान ये दे दो तो ऐसा करूंगा। वो दे दो तो वैसा करूंगा। ये भक्ति कैसे हुई? यह तो व्यापार हुआ। भक्ति तो निस्वार्थ प्रेम की भावना से उपजती है। भक्त को तो कण-कण में भगवान नजर आता है। मिट्टी हो, पत्थर हो या सोना हो, उसके लिए सब बराबर है।


असली समस्या यही है कि 99 प्रतिशत लोग भगवान को सिर्फ लाभ और डर की वजह से पूजते हैं। उनमें भक्ति नहीं होती है। यदि सही मायने में भक्ति हो तो राग, द्वेष, चिंता और अविश्वास की कोई जगह ही नहीं रह जाएगी। फिर आपकी चिंता आपको नहीं करनी होगी। भगवान आपकी चिंता करेंगे।



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