हवन का वास्तविक अर्थ जानें, करें जीवन सफल

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हवन की महत्ता
हवन की महत्ता

Know the true meaning of Hawan : हवन का वास्तविक अर्थ जानें। इसे समझ कर और अपना कर जीवन सफल करें। आम तौर पर लोग हवन के मूल भाव को ही नहीं समझते हैं। उन्हें लगता है कि हवन के लिए काफी तामझाम और सामग्री की आवश्यकता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। आज मैं आपको हवन के मूल भाव को बता रहा हूं। इसके साथ ही उसकी दो विधियों की जानकारी दे रहा हूं। इसे करने के लिए किसी भी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है। शरीर ही साधन या यज्ञ भूमि होता है। श्वास हवन सामग्री होती है। योगाग्नि में श्वासरूपी हविष्य का हवन होता है। प्राचीन काल से ही तपस्वी इस विधि का प्रयोग करते रहे हैं। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने भी उन योगियों की प्रशंसा की है जो प्राणवायु का अपानवायु में हवन करते हैं।

तपस्वी योग के माध्यम से करते हैं आंतरिक हवन

प्राचीन काल में तपस्वी योग के माध्यम से हवन करते थे। आज भी पहुंचे साधक ऐसा ही करते हैं। इसमें वे आंतरिक हवन और यज्ञ करते हैं। कई पहुंचे साधक आज भी धड़ल्ले से इस प्रक्रिया को अपनाते हैं। यह अत्यंत प्रभावी है। इसमें फल भी शीघ्र मिलता है। हवन का वास्तविक अर्थ श्रीमद्भगवद्गीता में भी बताया गया है। उसके अनुसार परमात्मा के निमित्त किया गया कोई भी कार्य यज्ञ कहा जाता है। परमात्मा के निमित्त किए कार्य में संस्कार और कर्म का बंधन नहीं होता है। अर्थात, ये चित्त को अहंकार की ओर नहीं धकेलते हैं। कृष्ण कहते हैं-अर्पण ही ब्रह्म है। हवि ब्रह्म है। अग्नि ब्रह्म है। आहुति ब्रह्म है। कर्म रूपी समाधि भी ब्रह्म है। और जिसे प्राप्त किया जाना है वह भी ब्रह्म ही है। यज्ञ परब्रह्म स्वरूप माना गया है। कई योगी ब्रह्म-अग्नि में आत्मा का आत्मा में हवन करते हैं।

आत्मसंयम की योगाग्नि में विषयों की आहुति

पहली विधि में आत्मसंयम की योगाग्नि में विषयों की आहुति दी जाती है। कई योगी इंद्रियों के विषयों को रोककर अर्थात इंद्रियों को संयमित कर हवन करते हैं। अन्य योगी शब्दादि विषयों का इंद्रियों रूप अग्नि में हवन करते हैं। अर्थात मन से इंद्रियों के विषयों को रोकते हैं। अन्य कई योगी सभी इंद्रियों की क्रियाओं एवं प्राण क्रियाओं को एक करते हैं। मतलब कि इंद्रियों और प्राण को वश में करते हैं। उन्हें एक तरह से निष्क्रिय करते हैं। इन सभी वृत्तियों को करने से ज्ञान प्रकट होता है। ज्ञान द्वारा आत्मसंयम की योगाग्नि प्रज्ज्वलित कर संपूर्ण विषयों की आहुति देते हुए आत्म-यज्ञ करते हैं। हवन का वास्तविक अर्थ यही है। आज को तरीका प्रचलित है, वह प्रतीक रूप में है। फल उसमें भी मिलता है लेकिन यह सर्वश्रेष्ठ है।

अपान वायु में प्राण वायु का हवन

दूसरी विधि भी महत्वपूर्ण है। इसे भी योगियों व तपस्वियों ने अपनाया है। कई योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं। जैसे अनुलोम-विलोम से संबंधित श्वास क्रिया। कई अन्य प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं। जैसे गुदा संकुचन अथवा सिद्धासन। कुछ अन्य योगी प्राण और अपान दोनों प्रकार की वायु को रोककर प्राणों का प्राण में हवन करते हैं। जैसे रेचक और कुंभक प्राणायाम। इस प्रकार के हवन को करते हुए मंत्रों का मानसिक जप भी किया जाता है। कई योगी सब प्रकार के आहार को जीतकर अर्थात नियमित आहार करने वाले प्राण वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं। अर्थात प्राण को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा काम, क्रोध एवं अज्ञान रूपी पापों का नाश हो जाता है। यह हवन सभी विधियों में श्रेष्ठ है। क्योंकि इससे मानसिक विकारों का नाश हो जाता है।

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