महाशिवरात्रि विशेष : भक्तों की मनोकामना को झट पूर्ण कर देते हैं भोलेनाथ

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पुरुष और प्रकृति को एक-दूसरे के पूरक के रूप में स्थापित करने वाले समय के देवता महाकाल के पर्व महाशिवरात्रि का पर्व उनकी भक्ति में लीन होकर उनकी उपासना करने का सर्वथा उपयुक्त समय है। यदि आप साधक हैं तो इस अवसर पर व्रत, पूजन और रात्रि जागरण तीनों आवश्यक है। यदि सिर्फ भक्त हैं तो जितना कर सकें, उसी से भोलेनाथ प्रसन्न होकर मनोकामना पूर्ण कर देते हैं। देवादिदेव महादेव भक्तों के सर्वाधिक प्रिय एवं मनोकामना पूर्ण करने में अग्रणी माने जाते हैं। उनकी पूजा में विधि-विधान, ध्यान, जप-तप आदि कर्मकांड की ज्यादा जरूरत नहीं है, वे सिर्फ भाव के भूखे हैं। भक्तों की भावना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। उनका पूजन सबसे आसान है। भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि के चढ़ावे से ही भगवान संतुष्ट होकर जाते हैं।


भोलेनाथ की भक्ति में सबसे आवश्यक तत्व है भावना। भक्ति भावना के साथ यदि समर्पण, अर्थात अहं भाव का लोप हो तो भोलेनाथ तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त के लिए कुछ भी करने को तत्पर हो जाते हैं। यदि भक्ति में अहं भाव शेष है तो शिव से वरदान तो पाया जा सकता है लेकिन उन्हें प्राप्त करना असंभव है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण त्रिलोक विजेता रावण है। रावण उनका महान भक्त कहलाता था। उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए कई बार अत्यंत कठोर तपस्या की थी और उनसे ढेर सारे वरदान भी पा लिए थे, लेकिन वह कभी भी शिवतत्व को प्राप्त नहीं कर पाया। क्योंकि उसकी साधना में भक्ति के साथ समर्पण नहीं, बल्कि अहंकार था। वह शिवमय बनने के बदले शिव तत्व को बलात या छल से हरण करना चाहता था। इसलिए उसने शिव कई बार अपने साथ ले जाने का प्रयास किया। एक बार तो उसने महादेव को कैलाश सहित उठाकर लंका ले जाने का दुस्साहसिक प्रयास तक किया था। लेकिन इन प्रयासों में उसे कभी सफलता नहीं मिली। उसकी भक्ति में कभी त्याग व समर्पण नहीं आ सका और न कभी अहंकार का लोप हो सका। इसलिए उसे कभी शिवत्व की प्राप्ति नहीं हो सकी। वह जीवन भर अपने अहंकार के साथ भटकता ही रहा।


इस बारे में ओशो ने शिव को प्राप्त करने के उपायों की चर्चा करते हुए भक्ति और समर्पण के साथ बल व हिंसा की तुलना करते हुए किसी वस्तु या व्यक्ति को हासिल करने के बारे में बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था। अपने प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा था कि सत्य की खोज (शिवत्व की तलाश) का दो मार्ग है। एक पुरुष मार्ग-आक्रमण, हिंसा व छीना-झपटी का और दूसरा स्त्री मार्ग-प्रेम, समर्पण और प्रतिक्रमण का। विज्ञान पुरुष मार्ग है। वह भी सत्य की खोज में जुटा हुआ है। कड़ी मेहनत और लगातार प्रयास के बल पर उसने प्रकृति के कई रहस्यों को उजागर कर दिया है। ढेर सारी शक्ति उसने हासिल कर ली है लेकिन इस क्रम में वह प्रकृति के मूल तत्व (शिवत्व) से बहुत दूर जा चुका है। इसलिए इतना पा लेने के बाद भी उसकी भूख बढ़ती जा रही है। उसमें असंतोष बढ़ता जा रहा है और उसके कुपरिणाम भी उसे भोगने पड़ रहे हैं। दूसरी ओर जिसने प्रेम, समर्पण और प्रतिक्रमण का मार्ग अपनाया है, वह खुद में मस्त है। अभाव में भी उसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं। वह संतुष्ट है, इसलिए परिपूर्ण है। विज्ञान की तरह उसमें कोई लालसा शेष नहीं है। उसने शिवत्व को पा लिया है। इसे और स्पष्ट करते हुए ओशो ने कहा था कि यदि तुम राह चलती किसी महिला पर हमला कर दो तो बलात्कार हो जाएगा। तुम महिला के शरीर पर कब्जा कर लोगे लेकिन उसकी आत्मा तुम्हें कभी नहीं मिल सकेगी। इस तरह से तुम कभी उसका प्रेम हासिल नहीं कर सकोगे। परमात्मा के साथ भी ऐसा ही होता है। यदि आप एक योद्धा की तरह तंत्र, मंत्र, यंत्र, ध्यान, योग आदि से परमात्मापरमात्मा से शक्ति, मनोकामना आदि की पूर्ति करना चाहें तो कर सकते हैं। लेकिन इससे परम तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकेगी। आपकी मेहनत पर शिव आपको यथोचित फल तो दे देंगे लेकिन उनका प्रेम पाना और शिवत्व को छू पाना भी संभव नहीं हो सकेगा।


वास्तव में शिव कोई नाम या सीमा नहीं बल्कि असीम और अनंत है। इसे ईश्वर, सर्वशक्तिमान, सार्वभौमिक, चेतना आदि नाम भी दे सकते हैं। शिवलिंग को भी शक्ति के साथ ही त्रिदेव का संयुक्त रूप माना जाता है। मान्यता है कि शिवलिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपरी भाग में महेश्वर का वास है। लिंग की वेदी में माता शक्ति विराजती हैं। अत: शिवलिंग की पूजा का मतलब एक साथ त्रिदेव और माता शक्ति की पूजा करना है। इसलिए कहा जाता है कि शिवतत्व को समझने का मतलब आपने सब कुछ समझ लिया। शिवतत्व को समझना और इसमें एकाकार हो जाना ही शिवयोग कहलाता है। यह कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही है। अत: इसे पाने के लिए किसी बाहरी प्रयास की आवश्यकता भी नहीं है। मंत्र, योग, ध्यान, भक्ति, समर्पण आदि से हम इसे अपने अंदर ही महसूस कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हमारी अंतस की यात्रा है। इसके लिए बाहरी दुनिया कटकर खुद के अंदर यात्रा पर रवाना होना होगा। जिसने अपने अंह भाव के साथ ईर्ष्या-द्वेष, लोभ, मोह, काम, क्रोध आदि पर नियंत्रण पा लिया हो, वही इस यात्रा का उपयुक्त पात्र है। अर्थात यह सारी लड़ाई खुद से है। इसमें योग, ध्यान, मंत्र, प्रार्थना, व्रत एवं सब कुछ ईश्वर को समर्पित करने में हमें मदद करते हैं। इनके नियमित अभ्यास से हमारी पात्रता बढ़ती जाती है लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि हम अपने भावों के प्रति हमेशा सजग रहें। उसकी लगातार निगहबानी करते रहें कि वह कहीं भटक तो नहीं रहा है। अहं का भाव कहीं चुपके से सर तो नहीं उठा रहा है। यह अभ्यास कठिन अवश्य है लेकिन असंभव नहीं। यदि आपने कुछ माह तक लगातार इसका अभ्यास किया तो आपके अंदर की पात्रता बढ़ने लगती है। फिर विश्वास रखें कि भगवान अत्यंत कृपालु हैं। यदि आपने उनकी ओर एक पग भी बढ़ाया तो वह चार पग बढ़ाकर आपको थाम लेंगे।


मनोकामना पूर्ण करने के लिए उपयोगी उपाय

सुबह नहा-धोकर दिन भर व्रत रखें और सुबह, दोपहर शाम को शिव महिमा स्तोत्र का पाठ करें। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ, ऊं नम: शिवाय एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप भी कल्याणकारी होता है। कई स्थानों पर लोग इस दिन शिव-पार्वती का विवाह करते हैं। मान्यता है कि इससे शिव और शक्ति दोनों की कृपा मिलती है। शिव का आराधना करते समय कोशिश करें कि गले में रूद्राक्ष की माला हो और मस्तक पर त्रिपुंड (ललाट पर भस्म से लगाई जाने वाली तीन रेखाएं) हो। भगवान को बेल पत्र बहुत पसंद हैं अत: इनके पूजन में इसका समावेश अवश्य होना चाहिए। इस दिन सुबह किसी भी शिवमंदिर में जलाभिषेक अवश्य करना चाहिए। यदि आप मंदिर से दूर हों तो घर में ही पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन व जलाभिषेक करें।



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