खुद सोना बना सकते हैं, प्राचीन ग्रंथों में हैं बनाने की विधि

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खुद सोना बना सकते हैं, प्राचीन ग्रंथों में हैं बनाने की विधि
पारा और उससे बना सोना।

methods to make gold in ancient books : खुद सोना बना सकते हैं आप। प्राचीन ग्रंथों में हैं इसे बनाने की विधि। शायद इसी कारण भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। आश्चर्य की बात है कि उस समय देश में सोने की खान नहीं थी। जाहिर है कि सोने का स्रोत तब खान नहीं था। उस समय सोने को बनाया जाता था। हमारे ऋषि-मुनियों ने उसे बनाने की विधि विकसित की थी। वेद में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऐसे ही दुर्लभ ज्ञान के कारण भारत को विश्व गुरु कहा जाता था।

विदेशी आक्रमणकारियों ने मूल ग्रंथ नष्ट कर दिए

पहले गुरुकुल में इसकी शिक्षा दी जाती थी। बाद में नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में यह शिक्षा दी जाने लगी। लगभग 1200 वर्षों तक देश में विदेशी आक्रमणकारी तांडव मचाते रहे। उन्होंने न सिर्फ इसे लूटा बल्कि शासन करने के लिए यहां के अमूल्य ज्ञान-विज्ञान के केंद्र धर्म व शिक्षा स्थलों को नष्ट कर दिया। ताकि यहां लोग अपनी शिक्षा, संस्कृति और गौरव को भूल जाएं। बड़े मंदिर के साथ ही नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। उनके नष्ट होने के साथ ही खत्म हो गई हमारी धरोहर अधिकतर पुस्तकें। उसे पढ़ कर खुद सोना बना सकते हैं। हालांकि अब उसे ढूंढना बेहद कठिन है।

वेद में है स्वर्ण बनाने की विधि

ऋग्वेद सहित कई प्राचीन ग्रंथों में हैं स्वर्ण बनाने की विधियां। राक्षस गुरु शुक्राचार्य ने ऋग्वेदीय उपनिषद की सूक्त में स्वर्ण बनाने की विधि बतायी है। श्रीसूक्त के मंत्र और प्रयोग गुप्त व सांकेतिक भाषा में हैं। उन्हें समझना भी कठिन है। 10वीं सदी में गुजरात के सोमनाथ के निकट नागार्जुन नामक वैद्य थे। कहा जाता है कि वे रोज 100 किसो सोना बनाते थे। उन्होंने रस रत्नाकर नामक पुस्तक लिखी। उसमें भी सोना बनाने की विधि है। इसके साथ ही अन्य धातुओं के सात ही खनिज निकालने की विधि और उसे शुद्ध करने की विधि बताई गई है। अधिकतर पुस्तकें पहले ही नष्ट कर दी गईं। शिक्षा का माध्यम खत्म करने से वैसे विद्वान भी अब नहीं रहे। अतः अब उनकी व्याख्या कर सोना बनाना असंभव सा है।

ऋग्वेद से संबंधित श्रीसूक्त में सोना बनाने की विधि

श्रीसूक्त में सोना बनाने की विधि से संबंधित 16 मंत्र हैं। मंत्र की भाषा गोपनीय सी है। इसलिए उसे खुद समझना अत्यंत कठिन है। इसके साथ ही बनाने की प्रक्रिया जटिल और भी पाठकों की जानकारी के लिए नीचे श्रीसूक्त के कुछ मंत्र दे रहा हूं। मंत्र के साथ उसके शब्दों के अर्थ भी देने की कोशिश की जा रही है। अर्थ का पूरी तरह से गारंटी नहीं है। बिना सही गुरु के इसे आजमाने की कोशिश नहीं करने का भी आग्रह है। यह सही है कि आप खुद सोना बना सकते हैं। लेकिन इसमें अत्यंत सावधानी जरूरी है।

श्रीसूक्त के मंत्र, शुरुआत पहले से

ऐसी विधि जिससे आप खुद सोना बना सकते हैं। यहां उन्हीं में से एक विधि दी जा रही है। शुरुआत पहले मंत्र से।

ॐ हिरण्य्वर्णां हरिणीं सुवर्णस्त्र्जां।

चंद्रां हिरण्यमणीं लक्ष्मीं जातवेदो मआव।

अर्थ– हिरण्य्वर्णां- कूटज। हरिणीं- मजीठ। स्त्रजाम- सत्यानाशी के बीज। चंद्रा- नीला थोथा। हिरण्यमणीं- गंधक। जातवेदो- पाराम। आवह- ताम्रपात्र।

दूसरा मंत्र

तां मआवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।

यस्या हिरण्यं विंदेयं गामश्वं पुरुषानहं।

अर्थ– तां- उसमें। पगामिनीं- अग्नि। गामश्वं- जल। पुरुषानहं- बीस।

तीसरा मंत्र

अश्व पूर्णां रथ मध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीं।

श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीजुषातम।

अर्थ– अश्वपूर्णां- सुनहरी परत। रथमध्यां- पानी के ऊपर। हस्तिनाद- हाथी के गर्दन से निकलने वाली गंध। प्रमोदिनीं- नीबू का रस। श्रियं- सोना। देवी- लक्ष्मी। पह्वये- समृद्धि। जुषातम- प्रसन्नता।

विशेष सावधानी : इस विधि से खुद सोना बना सकते हैं। ध्यान रखें इस समेत हर विधि को पहले ठीक से समझ लें। योग्य वैद्याचार्य की देख-रेख में ही करें। इस प्रक्रिया के दौरान हानिकारक गैस निकलती हैं। इससे गंभीर बीमारी का खतरा है। अतः अत्यंत सावधान रहना आवश्यक है।

आयुर्वेदाचार्य ने गांधी जी के समक्ष बनाया सोना, शिलालेख में है जिक्र

वाराणसी के आयुर्वेदाचार्य कृष्णपाल शर्मा ने गांधी के समक्ष सोना बनाया था। उस समय इस अद्भुत चमत्कार को देखने के लिए कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। बिरला मंदिर परिसर में लगे शिलालेख में यह बात दर्ज है। शिलालेख के अनुसार पं कृष्णपाल शर्मा ने 27 मई 1941 को बिरला हाउस में एक तोला पारे से एक तोला सोना बनाया। उस समय वहां गांधीजी, उनके सचिव महादेव देसाई, युगल किशोर बिड़ला, चीफ इंजीनियर विल्सन, बिरला मिल दिल्ली के सेक्रेटरी सीताराम खेमका जैसे दिग्गज उपस्थित थे। बनाने की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी न हो इसका पुख्ता इंतजाम किया गया था। सोना की कुशल जौहरी से जांच कराई गई। आयुर्वेदाचार्य ने साबित किया कि वे खुद सोना बना सकते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें यह विधि एक ऋषि ने बताई थी। किसी योग्य व्यक्ति के न मिलने पर उन्होंने यह ज्ञान किसी को नहीं दिया।

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