तिलक लगाने के चमत्कारिक प्रभाव और लाभ

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तिलक लगाने के चमत्कारिक प्रभाव और लाभ
तिलक लगाने के चमत्कारिक प्रभाव और लाभ

Miraculous effects of applying Tilak : तिलक लगाने के चमत्कारिक प्रभाव और लाभ के बारे में जानें। यह मात्र धार्मिक कृत्य ही नहीं है। इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव उसे लगाने वाले पर पड़ता है। आमतौर पर तिलक को मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच लगाने की परंपरा है। अधिकतर लोग तिलक लगाने से इसी का अर्थ समझते हैं। कम लोगों को पता है कि तिलक ललाट ही नहीं, अपितु शरीर में 12 स्थानों पर लगाया जाता है। ये स्थान हैं-सिर, ललाट, कंठ, हृदय, दोनों बाहु, बाहु मूल, नाभि, पीठ और दोनों बगल। इन सभी स्थानों पर तिलक लगाने के अलग-अलग निहितार्थ और लाभ हैं। इनमें मस्तक को वह स्थान माना गया है जहां आत्मा रूप में जीव स्थित होता है। इसलिए इस स्थान पर तिलक लगाने की परंपरा अधिक है। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के तिलक का भी भिन्न लाभ है। जानें इन सभी के बारे में।

ललाट पर तिलक लगाने के लाभ

सबसे अधिक तिलक मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर लगाए जाते हैं। यह स्थान हमारे चिंतन-मनन का केंद्र है। चेतन-अवचेतन अवस्था में भी यह जाग्रत एवं सक्रिय रहता है। इसे आज्ञा-चक्र भी कहते हैं। इन दोनों के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील व ऊर्जावान बनाने के लिए तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर यदि सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केसर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से व्यक्ति सात्विक एवं तेज पूर्ण होता है। उसके आत्मविश्वास में अभूतपूर्ण वृद्धि होती है। मन निर्मल होता है और मनुष्य के संयम और शांति में वृद्धि होती है।

तिलक लगाने का महत्व व विधि

ललाट पर तिलक लगाने से मस्तिष्क को शांति और शीतलता मिलती है। इससे मस्तिष्क में बीटाएंडोरफिन और सेराटोनिन नामक रसायनों का स्राव संतुलित मात्रा में होने लगता है। इनकी कमी होने से उदासीनता और निराशा बढ़ती है। तिलक लगाने के चमत्कारिक लाभ तो हैं ही, यह उदासीनता और निराशा से मुक्ति प्रदान करने में सहायक भी है। अब जानें कि किस उंगली तिलक लगाने से क्या होता है। अनामिका से तिलक करने से मन को शांति मिलती है। मध्यमा से आयु बढ़ती है। अंगूठे से तिलक करना पुष्टिदायक माना जाता है। तर्जनी से तिलक करने पर मोक्ष मिलता है। विष्णु संहिता के अनुसार देव कार्य में अनामिका, पितृ कार्य में मध्यमा, ऋषि कार्य में कनिष्ठा तथा तांत्रिक कार्यों में प्रथमा उंगली का प्रयोग होता है। तिलक कई तरह के होते हैं। इनमें प्रमुख हैं- मृतिका, भस्म, चंदन, रोली, केसर, सिंदूर, कुंकुम, गोपी आदि।

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विभिन्न रंगों व द्रव्यों के तिलक की उपयोगिता

अलग-अलग रंगों और द्रव्यों के तिलक की उपयोगिता भी भिन्न है। चंदन का तिलक ताजगी लाने के साथ पापों का नाश करता है। लक्ष्मी की कृपा होती है। ज्ञान तंतु संयमित व सक्रिय रहते हैं। कुमकुम का तिलक तेजस्विता बढ़ाता है। मिट्टी के तिलक से बुद्धि बढ़ती है। केसर के तिलक से सात्विक गुण के साथ बृहस्पति ग्रह का बल बढ़ता है। हल्दीयुक्त तिलक से त्वचा शुद्ध होती है। सिंदूर के तिलक को शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। दही का तिलक चंद्र बल बढ़ाता है। इत्र के तिलक से शुक्र का बल बढ़ता है। विष्णु आदि देवताओं की पूजा में पीत चंदन, गणेश पूजा में हरिद्रा, पितृ कार्यों में रक्त चंदन, शिव पूजा में भस्म, ऋषि पूजा में श्वेत चंदन, मानव पूजा में केसर और चंदन, लक्ष्मी पूजा में केसर एवं तांत्रिक कार्यों में सिंदूर का प्रयोग तिलक के लिए करना चाहिए।

परंपरा और मतों के अनुसार तिलक के प्रकार

सभी पंरपरा और मतों में तिलक लगाने के चमत्कारिक लाभ को स्वीकार किया गया है। हालांकि शैव, शाक्त, वैष्णव आदि मतों के तिलक में अंतर होता है। सनातन धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ हैं और संप्रदाय हैं उन सबके अलग-अलग तिलक होते हैं। शैव ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाते हैं। शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन और बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा होती है। विष्णुस्वामी तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भौंहों के बीच तक आता है। रामानंद तिलक विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है। गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।

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