सबसे बड़ी ताकत है सकारात्मक सोच

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ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन
ग्रहों के आधार पर करें भूमि व भवन के वास्तु का संतुलन।

सोच और भावना का इंसान के जीवन पर किस तरह और कितना असर पड़ता है इस बारे में धर्म गुरुओं से लेकर विचारकों एवं प्रेरकों ने बहुत सारी बातें कही हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान भी भाव के भूखे होते हैं। भक्ति भाव से उनकी उपासना करने तथा उन पर अटूट विश्वास करने वालों को कभी निराशा नहीं मिलती है। ऐसे लोगों के लिए खुद भगवान भी चिंतित रहते हैं कि उसे कोई कष्ट न हो। ऐसे में मनुष्य की क्या बिसात कि वह अप्रभावित रह जाए। किसी व्यक्ति पर यदि आप अटूट भरोसा करें, उसके प्रति लगातार सकारात्मक बने रहें और उसमें सच्चे मन से विश्वास दिखाते रहें तो कोई कारण नहीं कि वह आपकी कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। इसके ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे, जब सकारात्मक शक्ति के बल पर बिगड़े काम बना लिये गए।


यहां हम ऐसे ही उदाहरणों में से एक – दुनिया भर में जाना-माना नाम थॉमस अल्वा एडीसन के बारे में दे रहे हैं कि किस तरह एक मंदबुद्धि बच्चा अपनी मां के अटूट विश्वास, प्रेम और सकारात्मक सोच के बल पर महान वैज्ञानिक बन गया।


थॉमस एल्वा एडीसन जब प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थी थे, तो पढ़ाई में बेहद कमजोर थे। अक्सर उनके शिक्षक उनकी कमजोरी के बारे में उनकी मां से शिकायत करते रहते थे। काफी प्रयास के बाद भी जब थॉमस में कोई सुधार देखने को नहीं मिला तो निराश शिक्षक ने उन्हें स्कूल से निकालने की सूचना वाला पत्र एक बंद लिफाफे में उनके हाथ में ही देकर घर भेज दिया। घर आकर उन्होंने वह लिफाफा अपनी मां को दिया और बताया:- ” मेरे शिक्षक ने इसे दिया है और कहा है कि इसे अपनी माताजी को ही देना..!”  मां ने लिफाफा खोलकर देखा, अंदर पत्र था। पत्र पढ़कर माँ की आँखों में आँसू आ गए और वो जोर-जोर से रोने लगी। जब एडीसन ने मां से पूछा कि “इसमें क्या लिखा है..?” तो सुबकते हुए आँसू पोंछ कर वह बोलीं:- इसमें लिखा है.. “आपका बच्चा जीनियस है हमारा स्कूल छोटे स्तर का है और शिक्षक बहुत प्रशिक्षित नहीं हैं, इसे आप स्वयं शिक्षा दें। इसके बाद मां उन्हें खुद पढ़ाने लगीं।


इस घटना के कई वर्ष बीत गए। इस बीच उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया। और तब तक थॉमस एल्वा एडीसन जग प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन गए थे। उन्होंने कई महान अविष्कार किये। एक दिन वह अपनी पारिवारिक वस्तुओं को देख रहे थे। अलमारी के एक कोने में उन्होंने पुराने कागजों में कागज का एक टुकड़ा पाया। उत्सुकतावश उसे खोलकर देखा और पढ़ने लगे। यह वही कागज़ था जिसे उनके शिक्षक ने स्कूल की ओर से उन्हें दिया था..उस कागज़ में लिखा था-” आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर बेहद कमजोर है। उसमें सुधार के कोई लक्षण नहीं हैं। उसकी उपस्थिति से बाकी बच्चों की भी पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा है। अत: अब उसे और इस स्कूल में नहीं आना है। पत्र पढ़कर एडीसन आवाक रह गए और घंटों रोते रहे। उन्हें अपनी मां की सकारात्मक शक्ति और अपने जीवन में आए बदलाव के कारण का ज्ञान हो चुका था। बाद में उन्होंने पूरी घटना को अपनी डायरी में लिखा। और अंत में लिखा……..


एक महान माँ ने बौद्धिक तौर पर कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया।


तो दोस्तों यही है सकारात्मकता और सकारात्मक पालक (माता-पिता) की शक्ति। इसे जरूर आजामाएं। बच्चों पर ही नहीं, खुद पर एवं अपने आसपास के सारे लोगों पर भी। जल्द ही आपको सब कुछ अच्छा-अच्छा लगने लगेगा। अपनी दुनिया बदली हुई नजर आने लगेगी। याद रखें कि दुनिया में सकारात्मकता और उसकी शक्ति से ज्यादा ताकतवर कुछ भी नहीं है, नकारात्मकता भी नहीं। बल्कि सच कहें तो नकारात्मकता कोई शक्ति ही नहीं है। उसका मतलब है सकारात्मकता का अभाव। जैसे ही आप सकारात्मक होते हैं, नकारात्मकता आपके समक्ष टिक नहीं पाती है।



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