सृष्टि का विज्ञान है वेद-15

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आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को समय की मांग के अनुरूप बिना जाने-समझे न माना जाए, बल्कि वर्तमान समय को स्थितियों एवं कसौटियों पर कसा जाए। धर्म के नाम पर फैले आडंबर एवं नकली कर्मकांड को सिर्फ तभी दूर किया जा सकता है, जब धर्म को विज्ञान की कसौटी पर कसते हुए मौजूदा स्थिति के हिसाब से संशोधित और परिमार्जित किया जाए। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि हमारा धर्म अत्यंत समृद्ध और मानव जीवन के लिए कामधेनु की तरह उपयोगी है। इसका जितना ज्यादा दोहन किया जाएगा, हमारी स्थिति उतनी सुधरेगी। इसके लिए यह भी जरूरी है कि आध्यात्मिक रूप से शीर्ष पर पहुंचकर भी लगभग गुमनामी में जिंंदगी गुजार रहे लोगों को सामने लाकर उनके ज्ञान को सार्वजनिक किया जाए। योग के क्षेत्र में कुछ हद तक यह काम हुआ है, इसलिए उसकी ताकत आज पूरी दुनिया मानने लगी है।


इसी तरह का काम मंत्र, तंत्र और यंत्र के क्षेत्र में भी करने की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है कि शब्दों में ताकत होती है। शब्द से अब रोबोट, कंप्यूटर, पंखे, बल्ब आदि को चलाया जाने लगा है, ऐसे में हम सिद्ध मंत्रों को कैसे नकार सकते हैं। मंत्रों का सही तरीके से प्रयोग कर उससे मिलने वाली शांति व ताकत को कोई भी अनुभव कर सकता है। इस ब्लॉग में मैं आगे के लेखों में उसी विषय को सार्वजनिक करने और गुमनामी में साधन में जुटे लोगों और उनके ज्ञान को उनकी अनुमति से सामने लाने का प्रयास करुँगी। यह सही है कि सभी मंत्रों को पूरी तरह से आम नहीं किया जा सकता है। ऋषि परंपरा के दौरान भी प्रमुख मंत्रों को पात्र लोगों को ही देने का साक्ष्य मिलता है लेकिन कई ऐसे उपयोगी मंत्र हैंं जिनका उपयोग सामान्य रूप से ही कल्याणकारी होता है और उसे सार्वजनिक करने में भी कोई हर्ज नहीं है। नीचे दिए गए सूक्त 30 में साफ तौर पर अंकित है कि इंद्र पहले प्रत्यक्ष रूप में आकर मनुष्यों की मदद करते थे, उनके दुख-दरिद्रता को दूर करते थे तथा उन्हें सुखमय जीवन प्रदान करते थे। सभी धर्मों की मूल आत्मा यही है कि परमात्मा अत्यंत दयालु और मनुष्य के हितैषी हैं। बस उन्हें सिर्फ दिल से पुकारने की जरूरत है।


सूक्त-30

(ऋषि-शुन शेप आजीगर्ति। देवता-इंद्र, उषा। छंद-गायत्री।)

आ व इंद्रं क्रिविं यथा वाजयंत: शतक्रतुम्। मंहिष्ठं सिंच इंदुभि:।।1
शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदु निम्नं न रीयते।।2
सं  यन्मदाय  शुष्मिण एना ह्यस्योदरे। समुद्रो न व्यचो दधे।।3
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे।।4
स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते। विभूतिरस्तु सूनृता।।5।।28

अर्थ–हे मनुष्यों! तुमको बाहुबल प्राप्त कराने की इच्छा से महाबली इंद्र को हम गढ़ के समान सब ओर से खींचते हैं। नीचे की ओर जाने वाले जल के समान हजारों कलश दूध में मिलाने के लिए सैकड़ों कलश गिरते हुए सोमों को इंद्र प्राप्त करते हैं। जल के लिए विस्तृत हुए समुद्र के समान इंद्र बलकारी सोम के लिए अपने पेट को विस्तृत करते हैं। हे इंद्र! यह सोम आपके लिए है। आप इसे कबूतर द्वारा अपनी कबूतरी को प्राप्त करने के समान प्रेम से प्राप्त करते हैं। हे धनेश्वर! जिसके मुख में आपकी स्तुतिमय वाणी है, उसकी स्तुतियों से प्राप्त होने वाले उसके घर में ऐश्वर्य भर दीजिए। उसकी वाणी मधुर और सत्य हो।


उर्ध्वस्तिष्ठा  न  ऊतयेस् स्मिन् वाजे शतक्रतो। समन्येषु ब्रवावहे ।।6
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इंद्रमूतये।।7
आ घा गमद्यदि श्रवत् सहस्रिणीभिरूतिभि:। वाजेभिरूप नो हवम् ।।8
अनु  प्रत्नस्यौकसो  हुवे  तुविप्रतिं  नरम्। यं ते पूर्वं पितता हुवे ।।9
तं त्वा वयं विश्ववाश स्स् शास्महे पुरुहूत। सखे वसो जरितृभ्य:।।10।।29

अर्थ–हे महाबली इंद्र! इस युद्ध में हमारी रक्षा के लिए उठिए। हम दोनों भली प्रकार से मंत्रणा करें। हे सखे! हम प्रत्येक कार्य अथवा युद्ध के आरंभ में महाबली इंद्र का आह्वान करते हैं। यदि इंद्र ने हमारी पुकार सुन ली तो वह असंख्य रक्षक साधनों और शक्तियों के साथ अवश्य आएंगे। मैं अपने अग्रणी शक्ति स्वरूप इंद्र को पूर्वजों की भांति बुलाता हूं। हे इंद्र! हमारे पिता भी आपको बुलाते थे। हे वरणीय इंद्र! बहुतों से बुलाए गए आप स्तोताओं के शरणदाता मित्र हैं। हम आपके आह्वान की कामना करते हैं।


अस्माकं  शिप्रिणीनां  सोमपा:  सोमपावाम्।  सखे  वज्रिन्त्सखीनाम् ।।11
तथा तदस्तु सोमपा: सखे वज्रिन्  तथा कृणु। यथा  त  उश्मसीष्टये ।।12
रेवतीर्न:   सधमाद   इंद्रे  संतु   तुविवाजा:।  क्षुमन्तो  याभिर्मदेम ।।13
आ घ त्वावान् त्मनाप्त: स्तोतृभ्यो धृष्णवियान:। ऋणोरक्षं न चक्रयो: ।।14
आ  यद्  दुव:  शतक्रतवा  कामं  जरितृणाम्। ऋणोरक्षं न  शचीभि: ।।15।।30

अर्थ–हे सोमपायी वज्रिन! सोम से बलवान हुए हमारे मित्रों के लिए मित्र हों। हमारी यह इच्छा पूरी कीजिए कि हम अपने अभीष्ट के निमित्त सदा आपकी ही कामना किया करें। इंद्र के प्रसन्न होने पर हमारी गायें अधिक दूध दें, जिससे हम अधिक पुष्टि को प्राप्त करें। हे रूद्र! आपकी प्रार्थना करने पर आप स्वयं ही पहिए की धुरी के समान भाग्य को घुमाकर अधिक धन देते हैं। हे इंद्र! साधकों की साधना और कामना के अनुसार ही आप पहिए की धुरी के समान उनकी दरिद्रता को पलट देते हैं।


शश्वदिन्द्र:  पोप्रुथदिभर्जिगाय  नानददिभ:  शाश्वसदिभर्धनानि।
स नो हिरण्यरथं दंसनावान् त्स न: सनिता सनये स नोस्दात ।16
अश्विनावश्वावत्येषा  यातं  शवीरया। गोमद्  दस्रा हिरण्यवत् ।।17
समानयोजनो  हि  वां  रथो  दस्रावमर्त्य:। समुद्रे अश्विनेयते ।।18
न्यधन्यस्य मबर्धनि चक्रं रथस्य येमुथु:। परि द्यामन्यदीयते ।।19
कस्त  उष:  कधप्रिये भुजे मर्तो अमर्त्ये। कं नक्षसे विभावरि ।।20
वयं हि ते अमन्मह्यास्स्न्तादा पराकात्। अश्वे न चित्रे अरुषि ।।21
त्वं  त्येभिरा  गहि वाजेभिर्दुहितार्दिव:। अस्मे  रयिं नि धारय ।।22।।31

अर्थ–इंद्र सदा ही शत्रुओं के धन को अपने स्फूर्तियुक्त घोड़ों के द्वारा जीतते रहे हैं। उन्होंने अपने स्नेह वश हमको सोने का रथ प्रदान किया है। हे भीषण बल वाले अश्विनी कुमारों! आप अश्वों की गति से गाय और स्वार्णादि धन के साथ यहां आइए। हे अश्विनी कुमारों! आप दोनों के लिए जुतने वाला एक ही रथ आकाश मार्ग में चलता है। उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। हे अश्विनी कुमारों! आपने अपने रथ के एक पहिए को पर्वत पर स्थित किया है और दूसरा पहिया आकाश के चारों ओर चलता है। हे पापों का नाश करने वाले उषे! कौन मरण धर्मा मनुष्य आपके सुखों को प्राप्त कर सकता है? हे अश्व के समान गमन करने वाली कांतिमयी उषे! आप क्रोध रहित का ही हमने निकट या दूर तक चिंतन किया है। हे आकाश सुते! आप उन शक्तियों के साथ यहां आइए, जिनके द्वारा आप हमारे लिए उत्तम ऐश्वर्य की स्थापना कर सकें।



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