सृष्टि का विज्ञान है वेद-20

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Parivartan ki awaj

वैदिक साहित्य की मान्यता और स्वीकार्यता दुनिया भर में होने लगी है। वेद का यह मूल भाव अब दुनिया भर में स्थापित होने लगा है कि जैसा हम सोचते हैं, प्रकृति वैसा ही करती है। हमारी सोच के अनुसार शरीर ही नहीं पूरा ब्रहमांड तदनुसार बदलने लगता है। सवाल सिर्फ इतना होता है कि हमारी सोच कितनी प्रबल है। जितनी प्रबल सोच होगी, उसका असर भी उतना ही प्रभावशाली होगा। कमजोर और बिखरी हुई सोच का प्रकृति पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है। उससे सिर्फ संबंधित व्यक्ति का व्यक्तित्व बिखर जाता है। ध्यान दें कि बचपन में आप जिस तरह के शरीर वाले से सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं, आज आपके व्यक्तित्व पर उसकी बड़ी छाप अवश्य होगी। आज भी हम अपनी इच्छा और सकारात्मक सोच के बल पर शरीर और मन को अपने हिसाब से ढाल सकते हैं। जरूरत है तो सिर्फ मजबूत संकल्प और इच्छाशक्ति की। धर्म ग्रंथों से लेकर दुनिया भर के प्रेरक तक इस बात पर बल देने लगे हैं कि यदि सफल होना है तो अपनी सोच को पूरी तरह से सकारात्मक और प्रभावशाली बनाएं। मजबूत सकारात्मक सोच न सिर्फ हमारी शारीरिक व मानसिक क्षमता बढ़ाती है, अपितु परिस्थिति को भी हमारे अनुकूल बनाने लगती है। हमसे मिलने वाला व्यक्ति भी उससे अछूता नहीं रह पाता है। यदि हमारी सोच किसी के प्रति नकारात्मक होती है तो वह अनायास हमसे दुश्मन की तरह व्यवहार करने लगता है। इसी तरह किसी के प्रति हमारे मन में अत्यंत सकारात्मक भाव हो तो वह हमारे प्रति काफी हद तक अनुकूल हो जाता है। अब इस पर वैज्ञानिकों ने भी इस विषय पर प्रयोग शुरू कर दिया है और परिणाम देखकर चमत्कृत हो रहे हैं।


सिर्फ सोच से शरीर में फैला जहर : आइए, ऐसी ही एक घटना को देखते हैं। अमेरिका में जब एक कैदी को फांसी की सजा सुनाई गई तो वहां के कुछ वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों न इस कैदी पर कुछ प्रयोग किया जाय। उन्होंने सुनियोजित तरीके से कैदी को बताया गया कि हम तुम्हें फांसी देकर नहीं, बल्कि जहरीला कोबरा सांप से डसा कर मारेंगे। इसके बाद उसके सामने बड़ा सा जहरीला सांप लाया गया। कैदी को बताया गया कि यह सांप तुम्हें डसने के लिए आया है। इसके बाद कैदी की आंखें बंद करके कुर्सी से बांध दिया गया। फिर उसको सांप से डसाने के नाम पर दो सेफ्टी पिन्स चुभाई गई। यह क्या! चमत्कार देखने को मिला। कैदी की कुछ सेकेंड में ही छटपटा कर अकड़ते हुए मौत हो गई। उसका पोस्टमार्टम कराया गया तो आश्चर्यजनक रूप से पाया गया कि कैदी के शरीर में सांप के जहर के समान ही जहर है।


वैज्ञानिकों के लिए हैरत की बात थी कि बिना सांप के डसे या ऊपर से कोई जहर दिए उसके शरीर में ये जानलेवा जहर कहां से आया जिसने उस कैदी की जान ले ली। इसका संतोषजनक जवाब भारतीय आध्यात्म में है।……वह जानलेवा जहर उसके खुद शरीर ने ही सदमे में उत्पन्न किया था। हमारे हर संकल्प/भावना से शरीर और ब्रह्मांड में सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती रहती है। हमारे संकल्प/भावना के अनुरूप ही हमारे शरीर में हार्मोन का स्राव होने लगता है। वास्तव में यह हैरत की बात नहीं है। भारतीय संस्कृति में संकल्प की शक्ति का बहुत महत्व है। इसे और स्पष्ट करने के लिए कुछ और घटना को देखें। सामान्य रूप से देखें तो पाएंगे किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने पर भी कोई ठीक हो जाता है और कोई मौत का शिकार हो जाता है। कई लोग कैंसर से ग्रस्त होकर भी ठीक हो जाते हैं। इसका कारण वास्तव में उस व्यक्ति की मजबूत इच्छाशक्ति और सकारात्मक सोच में निहित है। ठीक इसी तरह से शोध से साबित हुआ है कि लोगों में 75 फीसद बीमारियों का मूल कारण नकारात्मक सोच से उत्पन्न ऊर्जा ही है।


इस कड़ी में मैं ऋग्वेद के सूक्त 37 और 38 के मंत्र एवं उनके शब्दार्थ दे रही हूं। उनके भाव को महसूस कीजिए और देखिए कि उसमें किस हद तक प्रकृति की न सिर्फ स्तुति की गई है बल्कि उसके प्रति पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए सकारात्मक भाव को बनाए रखा गया है।


सूक्त-37

(ऋषि-कण्वो घोर। देवता-मरुत। छंद-गायत्री)

क्रीलं  व:  शर्धो  मारुतमनर्वाणं  रथेशुभम्। कण्वा  अभि  प्र  गायत ।।1
ये पृषतीभिर्ऋष्टिभि: साकं वाशीभिरञ्जिभि:। अजायंत स्वभानव: ।। 2
इहेव  शृण्व  एषां  कशा  हस्तेषु  यद्  वदान्। नि  यामञ्चित्रमृञ्जते ।। 3
प्र  व:  शर्घाय  घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे। देवत्तं ब्रह्म गायत  ।।4
प्र शंसा  गोष्वघ्नयं  क्रीलं  यच्छर्धो मारुतम्। जम्भे  रसस्य वावृधे ।।5।।12

अर्थ–हे कण्व गोत्र वाले ऋषियों! क्रीड़ायुक्त अहिंसित मरुद्गण रथ पर सुशोभित हैं। उनके लिए स्तुतिगान कीजिए। वे स्वयं प्रकाश वाले बिंदु चिह्न युक्त मृग वाहन शस्त्रों, युद्ध में ललकारों आभूषणादि से युक्त उत्पन्न हुए हैं। उनके हाथों में चाबुक का शब्द हम सुन रहे हैं। यह अद्भुत चाबकु युद्ध में साहस बढ़ाने वाली है। वे मरुद्गण आपके बल को बढ़ाते और यशस्वी बनाते हैं, उन शत्रुनाशक की स्तुति कीजिए। दुग्धधात्री धेनुओं ने बैल से क्रीड़ां करने वाले मरुद्गणों की स्तुति की। वह वृष्ट रूप रस को पीकर वृद्धि को प्राप्त हुए हैं।


को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतय:। यत् सीमंतं न धूनुथ ।।6
नि वो यामाय  मानुषो  दघ्र  उग्राय  मन्यवे। जिहीत  पर्वतो  गिरि: ।।7
येषामज्मेषु   पृथिवी   जुजुर्वा   इव  विश्पति:। भिया  यामेषु  रेजते ।। 8
स्थिरं  हि  जानमेषां  वयो  मातुर्निरेतवे। यत्  सीमनु  द्विता  शव: ।। 9
उदु त्ये सूनवो  गिर:  काष्ठा  अज्मेष्वत्नत। वाश्रा  अभिज्ञु  यातवे ।।10।।13

अर्थ–आकाश-पृथ्वी को कंपित करने वाले मरुतों! आपसे बड़ा कौन है? आप वृक्ष की डालियों के समान लोकों को हिलाते हैं। हे मरुतों! आपके भय से मनुष्यों ने सुदृढ़ं खंभे खड़े किए हैं। आप बड़े जोड़ों वाले पर्वतों को भी कंपा देते हैं। उन मरुतों की गति से पृथिवी वृद्ध राजा के समान भय से कांपती है। उनका जन्म स्थान स्थिर है। उनकी मातृभूमि आकाश में पक्षी की गति भी निर्बाध है। उनका बल दुगुना होकर व्याप्त है। ये अंतरिक्ष में उत्पन्न मरुद्गण गमन के लिए जल का विस्तार करते हैं और रंभाने वाली गायों को घुटने-घुटने जल में ले जाते हैं।


त्वं चिद् घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृर्धम्। प्र च्यावयन्ति यामभि: ।।11
मरुतो    यद्ध   वो   बलं   जनां   अचुच्यवीतन।   गिरींरचुच्यवीतन ।।12
यद्ध   यांति  मरुत:  सं  ह  ब्रुवते स् ध्वन्ना।  शृणोति  कश्चिदेषाम् ।।13
प्र  यात  शीभमाशुभि:  संति  कण्वेषु  वो  दुव:। तत्रो  षु मादयाध्वै ।।14
अस्ति हि ष्मा मदाय व:स्मासि ष्मा वयमेषाम्। विश्वं चिदायुर्जीवसे ।।15।।14

अर्थ–अवश्य ही मरुदगण उस विशाल, अवध्य वेन पुत्र को अपनी गति से कंपाते हैं। हे मरुतों! आपने अपने बल से मनुष्यों को कर्म में प्रेरित किया है। आप ही मेघों को प्रेरित करने वाले हैं। मरुद्गण चलते हैं तो रास्ते में परस्पर बाते करते हैं। उनके उस शब्द को कौन सुनते हैं? हे मरुतों! वेग वाले वाहन से शीघ्र आइए। यह कण्ववंशी और अन्य विद्वान यहां एकत्रित हैं। उनके द्वारा हर्ष प्राप्त कीजिए। आपकी प्रसन्नता के लिए हवि प्रस्तुत है। हम आयु प्राप्त करने के लिए यहां विद्यमान हैं।


सूक्त-38

(ऋषि-कण्व घोर।  देवता-मरुत। छंद-गायत्री)

कद्ध   नूनं   कधप्रिय:   पिता  पुत्रं   न  हस्तयो:। दधिध्वे  वृक्तबहिंष:।।1
क्व नूनं कद् वो अर्थं गंता दिवो न पृथिव्या:। क्व वो गावो न रणयंति ।।2
क्व  व:  सुम्ना  नव्यांसि  मरुत:  क्व सुविता। क्वो विश्वानि सौभगा ।।3
यद्  यूयं  पृश्निमातरो  मार्तास:  स्यातन। स्तोता  वो  अमृत:  स्यात् ।।4
मा  वो  मृगो   न   यवसे   जरिता   भूदजोष्य:। पथा   यमस्य   गादुप ।।5।।15

अर्थ–हे स्तुतियों को चाहने वाले मरुतो! आपके लिए कुश बिछाई गई है। पिता द्वारा पुत्र को धारण करने के समान आप हमें कब धारण करेंगे? हे मरुतों! अब आप कहां हैं? पृथिवी के बदले आकाश मार्ग में क्यों घूमते हैं? आपकी गौयें क्या आपको पुकारती नहीं है? हे मरुतों! आपकी अभिनव कृपाएं, शुभ और सौभाग्य कहां हैं? हे आकाश पुत्रों! यद्यपि आप मरण धर्मा पुरुष हैं, पर आपका स्तोता (उपदेष्टा) अमर और शत्रु से कभी नष्ट नहीं होने वाला हो। जिस प्रकार घास के मैदान में मृग आहार प्राप्त करता है पर मृग के लिए घास असेवनीय नहीं होती, उसी प्रकार स्तोता भी सेवा प्राप्त करता रहे, जिससे उसे यम मार्ग से न जाना पड़े।


मो  षु  ण:   परापरा   निर्ऋतर्दुर्हणा   वधीत्।  पदीष्ट   तृष्णया   सह ।।6
सत्यं त्वेषा  अमवन्तो  धन्वञ्चदा रुद्रियास:। मिहं कृण्वन्त्यवाताम् ।।7
वाश्रेव  विद्युन्मिमाति  वत्सं न माता  सिषक्ति। यदेषां वृष्टिरसर्जि ।।8
दिवा चित् तम: कृण्वन्ति पर्जन्योनोदवाहेन। यत् पृथिवीं व्युन्तन्ति ।।9
अध  स्वनान्मरुतां  विश्वमा  सद्म   पार्थिवम्।  अरेजन्त  प्र  मानुषा: ।।10।।16

अर्थ–बारंबार प्राप्त होने वाली पाप की शक्ति हमारी हिंसा  न करे। वह तृण के समान नष्ट हो जाए। वे कांतिमान् रुद्र के पुत्र मरुद्गण मरुभूमि में भी वायु रहित वर्षा करते हैं। रंभाने वाली गाय के समान जब बिजली कड़कती है और वर्षा होती है, तब बछड़े का पोषण करने वाली गाय के समान ही मौन हुई बिजली मरुतों की सेवा करती है। जलवर्षक बादलों से मरुद्गण दिन में भी अंधेरा कर देते हैं। उस समय वे भूमि को वर्षा से सींचते हैं। मरुतों की गर्जना से पृथिवी पर बने हुए घर तथा मनुष्य भी कांप जाते हैं।


मरुतो वीलुपाणिभिश् चित्रा  रोधस्वतीरनु। यातेमखिद्रयामभि: ।।11
स्थिरा व: संतु नेमयो रथा अश्वास एषाम्। सुसंस्कृता अभीशव: ।।12
अच्छा वदा तना गिरा जराये ब्रह्मणस्पतिम्। अग्निं मित्रं न दर्शतम् ।।13
मिमीहि   श्लोकमास्ये   पर्जन्य   इव  ततन:। गाय   गायत्रमुक्थ्यम् ।।14
वन्दस्व  मारुतं  गणं  त्वेषं  पनस्युमर्किणम्। अस्मे  वृद्धा असन्निह ।।15।।17

अर्थ–हे मरुद्गण! आप दृढ़ खुर एवं निरंतर गति वाले अश्वों द्वारा उज्ज्वल नदियों की ओर गति कीजिए। हे मरुतों! आपकी पहिए की चाल, रथ की धुरी और रासें उत्तम हों तथा अश्व स्थिर व बलिष्ठ हों। मित्र के समान वेद रक्षक अग्नि को साध्य बनाकर स्तुति वचनों का उच्चारण कीजिए। अपने मुख से स्तोत्र रचिए। मेघ के समान स्तोत्र को बढ़ाइए। शास्त्रानुकूल स्तोत्र का गायन कीजिए। कांतिमान, स्तुतियों से युक्त मरुतों की स्तुति कीजिए। वे महान हमारे यहां वास करें।



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