शबरी माता मंदिर : आस्था व पर्यटन का अनोखा संगम

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शबरी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उसकी भक्ति की शक्ति से भगवान राम भी उसके पास खिंचे चले आए और प्रेम से दिए उसके जूठे बेर में बड़े प्रेम से चखे। सच है कि प्रेम, भक्ति और समर्पण के चरम का नाम है शबरी। राम भक्त शबरी। कहने को वह एक सामान्य भील महिला थीं लेकिन भक्ति की मिसाल थीं और उस दम पर कई देवी-देवताओं से भी श्रेष्ठ बन गईं। कहा जाता है कि लक्ष्मण को शक्तिबाण से इसीलिए मूर्छित होना पड़ा क्योंकि उन्होंने शबरी के जूठे बेर की अवहेलना की थी। यह भगवान पर भक्त की जीत का अनुपम उदाहरण है। मान्यता है कि माता शबरी के दर्शन और पूजन से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इस बार यात्रा में हम आपको उस स्थान पर ले चलते हैं जिसकी मान्यता माता शबरी के उस स्थान के रूप में है, जहां भगवान राम ने उनके जूठे बेर खाए थे। कहा जाता है कि भगवान विष्णु भी शबरी की भक्ति से प्रसन्न होकर एक अंश में वहीं रहने लगे।


शिवरीनारायण मंदिर : इस स्थान को पहले माता शबरी के नाम पर शबरीनारायण कहा जाता था। बाद में अपभ्रंश होकर यह शिवरीनारायण मंदिर के रूप में प्रचलित हुआ। प्रतिमा के रूप में भगवान विष्णु का एक अंश यहां रहने के कारण यह स्थान जगन्नाथपुरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। मान्यता है कि इसी स्थान पर प्राचीन समय में भगवान जगन्नाथ जी की प्रतिमा स्थापित थी, परंतु बाद में उसको जगन्नाथ पुरी (पुरी) ले जाया गया था। इसी आस्था के फलस्वरूप माना जाता है कि आज भी भगवान जगन्नाथ जी यहां पर आते हैं।


कहलाता है गुप्त धाम : देश के प्रचलित चार धाम उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिका धाम स्थित हैं। लेकिन मध्य में स्थित शिवरी नारायण को ”गुप्तधाम” का दर्जा प्राप्त है। इस बात का वर्णन रामावतार चरित्र और याज्ञवलक्य संहिता में मिलता है।


शबरी का परिचय

शबरी का असली नाम श्रमणा था, वह भील सामुदाय के शबर जाति से सम्बन्ध रखती थीं। उनके पिता भीलों के राजा थे। बताया जाता है कि उनका विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले सैकड़ों बकरे-भैंसे बलि के लिए लाये गए जिन्हें देख शबरी को बहुत बुरा लगा कि यह कैसा विवाह जिसके लिए इतने पशुओं की हत्या की जाएगी। शबरी विवाह के एक दिन पहले घर से भाग गई। घर से भागकर वे दंडकारण्य पहुंच गई।

दंडकारण्य में ऋषि तपस्या किया करते थे, शबरी उनकी सेवा तो करना चाहती थी पर वह पिछड़ी जाति की थी और उनको पता था कि उनकी सेवा कोई भी ऋषि स्वीकार नहीं करेंगे। इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला, वे सुबह-सुबह ऋषियों के उठने से पहले उनके आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ़ कर देती थीं, कांटे बीन कर रास्ते में रेत बिछा देती थी। यह सब वे ऐसे करती थीं कि किसी को इसका पता नहीं चलता था।

एक दिन ऋषि मतंग की नजऱ शबरी पर पड़ी, उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी। इस पर ऋषि का सामाजिक विरोध भी हुआ पर उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में ही रखा। जब मतंग ऋषि की मृत्यु का समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे।


भक्ति का अनूठा उदाहरण

मतंग ऋषि की मौत के बाद शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ़ रखती थीं। रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए। एक दिन शबरी को पता चला कि दो सुकुमार युवक उन्हें ढूंढ रहे हैं। वह समझ गईं कि उनके प्रभु राम आ गए हैं, तब तक वह बूढ़ी हो चुकी थीं, लाठी टेक के चलती थीं। लेकिन राम के आने की खबर सुनते ही उन्हें अपनी कोई सुध नहीं रही, वे भागती हुई उनके पास पहुंची और उन्हें घर लेकर आई और उनके पांव धोकर बैठाया। अपने तोड़े हुए मीठे बेर राम को दिए राम ने बड़े प्रेम से वे बेर खाए और लक्ष्मण को भी खाने के लिए कहा। लक्ष्मण को जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था। अत: बड़े भाई राम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। उस स्थान पर एक कटोरीनुमा पत्‍ता कृष्‍ण वट का है। लोगों का मानना है कि शबरी ने इसी पत्‍ते में रख कर श्रीराम को बेर खिलाए थे।


कैसे पहुंचें

माता शबरी का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के डांग जिले में एक सुंदर पहाड़ी पर स्थित है। चारों तरफ आज भी रमणीक वन हैं। अभ्यारण्य होने के कारण यह स्थान धार्मिक ही नहीं पर्यटन के लिहाज से भी मनमोहक है। भव्य और जीवंत मंदिर होने के कारण भक्तों एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं यह बिलासपुर से 64 किलोमीटर और रायपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रायपुर और बिलासपुर के लिए लगभग सभी प्रमुख शहरों से सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध है। कुछ स्थानों से रायपुर के लिए हवाई सेवा भी है। इन स्थानों से डांग जिला के मुख्यालय आहवा तक पहुंच कर सुबीर गांव पहुंचा जा सकता है। वहीं पास में है माता शबरी का पवित्र स्थान। 



 

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