बेहतर स्वास्थ्य के लिए करें शीतला माता की उपासना

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मौसम की प्रतिकूलता से बचाव और बेहतर स्वास्थ्य के लिए माता शीतला की उपासना अत्यंत उपयोगी है। चैत्र मास की शुरुआत में ही शीतला माता की पूजा की जाती है। यह मौसम स्वास्थ्य के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। अत: सभी लोगों को माता शीतला की पूजा अवश्य करनी चाहिए। भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार मौसम, परिस्थिति और व्यक्ति की जरूरत से सीधे जुड़े हुए हैं। शीतला माता की पूजा भी इसका अपवाद नहीं है। ऋतु परिवर्तन के समय शीतला माता का व्रत और पूजन करने का विधान है। यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी को शीतला सप्तमी और अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी की उपासना की जाती है। लेकिन स्कंद पुराण के अनुसार चैत्र से लेकर आषाढ़ तक के चार महीने में माता शीतला की उपासना करने के विधान है। शीतला सप्तमी का व्रत इस वर्ष 30 मार्च बुधवार को है। 31 मार्च गुरुवार को शीतला अष्टमी का व्रत है। शीतला माता का सप्तमी एवं अष्टमी को पूजन करने से दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाले रोग नहीं होते हैं। सप्तमी को व्रत करने के बाद अष्टमी तिथि को सुबह शीतल जल से स्नान कर –मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रवप्रशमनपूर्वकायुरारोगग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमीव्रतं करिष्ये– मंत्र से संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद व्रत कर सुंगधयुक्त गंध-पुष्पादि से माता शीतला की पूजा करके उन्हें मेवा, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल, चावल, लपसी, रोटी-सब्जी, शीतल पदार्थ (दिन में बनाए हुए) आदि का भोग लगाना चाहिए। इसके बाद शीतला स्तोत्र का पाठकर रात में घर को दीपों से सजाएं व जागरण करें। यदि आप व्रत रखने में सक्षम न हों तो मां को बाजड़ा अर्थात गुड़ और रोट अर्पित करके भी उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही माता की कथा का श्रवण भी हितकारी होता है। अंत में आरती करें।
शीतला माता की कथा-
एक गांव में एक स्त्री रहती थी, जो शीतलाष्टमी (बासोड़ा) की पूजा करती और ठंडा भोजन लेती थी। एक बार गांव में आग लग गई। उसका घर छोड़कर बाकी सबके घर जल गए। गांव के सब लोगों ने उससे इस चमत्कार का रहस्य पूछा। उसने कहा कि मैं बासोड़ा के दिन ठंडा भोजन लेती हूं और शीतला माता का पूजन करती हूं। आप लोग यह कार्य तो करते नहीं हैं। इससे मेरा घर नहीं जला और आप सबके घर जल गए। तब से बासोड़ा के दिन सारे गांव में शीतला माता का पूजन आरंभ हो गया। उसे देखकर अन्य इलाके के लोग भी उनकी पूजा शुरू कर लाभ प्राप्त करने लगे।
शीतला माता को भगवती दुर्गा का ही रूप माना जाता है। अन्य देवी-देवताओं की तरह यह भी प्रकृति से जुड़ी हैं। अत: इनका पूजन, व्रत और नियम भी प्रकृति के अनुकूल होते हैं। चैत्र महीने में जब गर्मी प्रारंभ हो जाती है, तो शरीर में अनेक प्रकार के पित्त विकार भी होने लगते हैं। शीतलाष्टमी का व्रत करने से व्यक्ति के पीत ज्वर, फोड़े, आंखों के सारे रोग, चिकनपॉक्स के निशान व शीतला जनित सारे दोष ठीक हो जाते हैं। इस दिन सुबह स्नान करके शीतला देवी की पूजा की जाती है।  इसके बाद एक दिन पहले तैयार किए गए बासी खाने का भोग लगाया जाता है।  यह दिन महिलाओं के विश्राम का भी दिन है, क्योंकि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। इस व्रत को रखने से शीतला देवी खुश होती हैं। यह ऋतु का अंतिम दिन है जब बासी खाना खा सकते हैं। इसके बाद बासी खाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह माना जाता है। यदि चतुर्मास की उपासना कर रहे हों तो माता को चैत्र में शीतल पदार्थ, वैशाख में घी और शर्करायुक्त सत्तू, जेष्ठ में एक दिन पूर्व बनाए हुए पूए तथा आषाढ़ में शर्करयुक्त खीर का नैवेद्य चढ़ाएं।
शीतला माता की आरती-
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,
आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता। जय शीतला माता…
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता,
ऋद्धि-सिद्धि चंवर ढुलावें, जगमग छवि छाता। जय शीतला माता…
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता,
वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता । जय शीतला माता…
इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा,
सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता। जय शीतला माता…
घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता,
करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता। जय शीतला माता…
ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,
 भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता। जय शीतला माता…
जो भी ध्यान लगावें प्रेम भक्ति लाता,
सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता। जय शीतला माता…
रोगन से जो पीडि़त कोई शरण तेरी आता,
कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता। जय शीतला माता…
बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता,
ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता। जय शीतला माता…
शीतल करती जननी तू ही है जग त्राता,
उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता। जय शीतला माता…
दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता,
भक्ति आपनी दीजे और न कुछ भाता।
जय शीतला माता…

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