मनमोहक..ओंकारेश्वर (द्वादश ज्योर्तिलिंग की यात्रा)

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द्वादश ज्योतिर्लिंग में ओंकारेश्वर का विशिष्ट स्थान है। नर्मदा के सुरम्य वादियों में बसा ओंकारेश्वर का वातावरण इतना सुंदर है कि यहां पहुंचने वाले को यहां से जाने की कभी इच्छा नहीं होती है। यहां के जीरो प्वाइंट से पूरे ओंकारेश्वर का भव्य नजारा दिखाई देता है। सिद्ध गणेश हनुमान मंदिर, कुबेर मंदिर होते हुए नागर घाट का दर्शन मन को काफू सुकून देने वाला था। नागर घाट पर नर्मदा माई में स्नान करने के लिए सुंदर पक्के घाट बने हुए हैं। वैसे ममलेश्वर मंदिर के करीब के घाट पर भी यहां नर्मदा में  स्नान किया जा सकता है। नागर घाट के ऊपर भगवान विष्णु का विशाल प्रतिमा है। यहां स्थित अन्नपूर्णा न्यास मंदिर में अखंड ओम नम: शिवाय का जाप चलता रहता है। ये जाप कथावाचक कमलकिशोर जी नागर की प्रेरणा से चल रहा है। ओंकारेश्वर पावर स्टेशन ( नर्मदा हाइड्रोलिक डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड, एनएचडीसी ) के सौजन्य से यहां नर्मदा पर झूले का पुल साल 2004 में बनाया गया है।
ओंकारेश्वर खाने पीने रहने में अपेक्षाकृत सस्ती जगह है। यहां आप 10 रुपये में इंस्टेट फोटो खींचवा सकते हैं। वहीं मंदिर में चढाने के लिए पुष्प गुच्छ महज दो रूपये में मिल जाता है। नर्मदा में स्नान और ओंकारेश्वर मंदिर में पूजन कर मन को अद्भुत शांति मिलती है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में साधु गण तपस्या भी करते हैं। ओंकारेश्वर में खाना सस्ता है। हमने बस स्टैंड कैंपस में प्रियाश्री भोजनालय में दिन का खाना खाया। 50 रुपये में मटर पनीर, पांच रुपये में घी चुपड़ी चपाती। सादी चपाती तीन रूपये में। प्रियाश्री ने हमें आम की खटमीठी अमिया परोसी। उसके स्वाद का कहना ही क्या। वैसे बस स्टैंड परिसर में और भी कई भोजनालय हैं। ओंकारेश्वर का बना अचार भी काफी अच्छा होता है। हमारे के एक साथी तो पांच किलो अचार पैक कराकर ले गए। यहां आप गन्ने का जूस, लस्सी और छाछ भी पी सकते हैं। पहाड़ की तलहटी में बसे गांव जैसा है ओंकारेश्वर।
वैसे ओंकारेश्वर में महंगी शापिंग के लिए कुछ नहीं है। लेकिन कुछ दिन प्रकृति की गोद में ईश्वर में आस्था के साथ गुजारने के लिए बड़ी अच्छी जगह हो सकती है। यहां मध्य प्रदेश टूरिज्म के अच्छे होटल भी हैं। तो रहने के लिए काफी सस्ती धर्मशालाएं भीं। ज्यादा जानकारी के लिए एमपी टूरिज्मकी साइट पर जाएं।

ओंकारेश्वर से उज्जैन वाया पातालपानी

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद हम वापस चले उज्जैन के लिए। वैसे ओंकारेश्वर से इंदौर 80 किलोमीटर है और उज्जैन 140 किलोमीटर। दोनों जगह के लिए बसें जाती हैं। पर हम फिर मीटर गेज ट्रेन में आरक्षण करा चुके थे। ओंकारेश्वर रोड से दोपहर ढाई बजे आने वाली अकोला उज्जैन पैसेंजर चार बजे पहुंची। इसमें पैसेंजर में भीस्लीपर क्लास के तीन कोच लगते हैं। कम लोग ही दिन में आरक्षण कराते हैं। ट्रेन के टीटीई साहब जैसे हमारा इंतजार ही कर रहे थे। मिलते ही बोले अच्छा आप लोग आ गए।
ओंकारेश्वर रोड के बाद अगला स्टेशन है बड़वाह। यहां से पहले ट्रेन नर्मदा नदी पर बने पुल को पार करती है। बड़वाह से एक और पर्यटक स्थल महेश्वर जाया जा सकता है। ( यहां से 40 किलोमीटर है महेश्वर की दूरी। ) महेश्वर में रानी अहिल्याबाई के बनवाए मंदिर और सुंदर नर्मदा तट हैं। देश में बहुत कम जगह अब मीटर गेज की ट्रेने चलती हैं। उज्जैन अकोला मार्ग भी गेज परिवर्तन की प्रक्रिया में है। ये रेल मार्ग इस इलाके के लोगों की जीवन रेखा की तरह है। रेलमार्ग का रास्ता पहाड़ी और मनोरम है।
मुखतियाड़ा, बलवारा, चोरल के बाद आया स्टेशन कालाकुंड। ट्रेन पहाड़ की घाटियों और सुरंगों से होकर गुजरती है। कालाकुंड के बाद आता है पातालपानी। यहां बहुत ही गहराई वाला झरना है। इसलिए इसका नाम दिया गया है पातालपानी। इंदौर के लोग यहां पिकनिक मनाने पहुंचते हैं। ट्रेन के टीटीई ने बताया कि बारिश के दिनों में झरने के पानी छींटे ट्रेन के डिब्बे में भी आ जाते हैं। पातालपानी के बाद आया महू छावनी। यहां ट्रेन 15 मिनट रूकी। महू डाक्टर भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली है। डा. अंबेडकर के पिता यहां छावनी में सेना में पदस्थापित थे। यहां पहुंचने पर मन में अंबेडकर के व्यक्तित्व, कृतीत्व और भारतीय संविधान में अमूल्य योगदान की याद ताजा हो गई।

साभार—-विद्युत प्रकाश मौर्य।

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