सृष्टि का विज्ञान है वेद-14

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मूर्ति पूजा का रहस्य जानें, वेदों में नहीं है जिक्र
मूर्ति पूजा का रहस्य जानें, वेदों में नहीं है जिक्र।

वास्तव में अब अधिकतर लोग न मंत्रों को ठीक से जानते हैं और ऩ उनमें उनके प्रति कुछ जानने की रूचि बची है। जो जानकार हैं, वह प्रचार से दूर रहते हैं, जिससे हमारी प्राचीन परंपरा और संस्कृति लुप्त होती जा रही है। इसी तरह मंत्र और उनके उपयोग का तरीका जानने वाले भी खत्म होते जा रहे हैं। सत्य की आतंरिक खोज का प्रचीन काम ठप सा पड़ गया है। वैज्ञनिकों की खोज वाह्य रूप में सीमित है। इस महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अनुसंधान चाहे बाहर से हो या भीतर से देर-सबेर पहुंचना एक ही जगह है। आइजैक न्यूटन और अलबर्ट आईंसटाइन जैसे महान वैज्ञानिकों ने सालों पहले इसे महसूस भी कर लिया और खुलकर स्वीकार भी किया।


आईंसटाइन ने अपनी सफलता का श्रेय भी वर्तमान के साथ पूर्व के लोगों व ताकतों को भी देते हुए उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की थी। हालांकि उन्हीं जैसे महान लोगों के आविष्कारों के बल पर बाकी कई लोग किसी ताकत के अस्तित्व को ही चुनौती देते हैं। सत्य में कोई अंतर्विरोध नहीं है। दरअसल समस्या के मूल में ऋषियों व महान धर्म गुरुओं को राज्यों से मिलने वाली मदद का बंद होना है। इसी कारण ऋषि परंपरा का नाश हुआ और उस ज्ञान को आगे बढ़ाने की गति थम सी गई। उस परंपरा से जुड़े लोगों में से कई ने अपना रूप बदल कर शोध के बदले धर्म प्रचार और पुरानी जानकारी की व्याख्या तक खुद को समेट लिया, जिसमें क्रमश: उनकी क्षमता व ज्ञान में कमी आती गई और मूल जानकारी लोप होती गई। यही कारण है कि अब मंत्र से अग्नि प्रज्जवलित नहीं होती और न देवता आहूतियां लेने आते हैं। इसका मतलब मंत्रों में ताकत की कमी नहीं बल्कि उसके प्रयोग की क्षमता व ज्ञान का अभाव होना है। ऋग्वेद के सूक्त 28 और 29 के निम्न मंत्रों का अवलोकन करें, सहज समझ लेंगे कि हमारे युगद्रष्टा ऋषियों ने प्रकृति और उससे जुड़ी चीजों-यहां तक कि ऊखल,मूसल एवं वनस्पति के प्रति भी सोमरस निर्माण के लिए कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं।उस काल में प्रकृति के प्रतीक देवताओं की स्तुति की जाती है तो बेलाग उनसे अपने लिए मांग करने में भी संकोच नहीं किया जाता है। अब देखिए कि आज के युग का इंसान चाहता तो सब कुछ है लेकिन न तो मन से कृतज्ञता ज्ञापन करता है और न खुलकर अपने लिए मांग पाता है। यह अस्पष्टता अंतत: उसी पर भारी पड़ती है और उसे असफलता और असंतोष के सागर में भटकने के लिए छोड़ देती है।


सूक्त-28 

(ऋषि-शुन शेप आजीगर्ति। देवता-इंद्र, यज्ञ, सोम। छंद-गायत्री अनुष्टुप)

यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति  सोतवे।  उलूखलसुतानामवेद्विंद्र  जल्गुल: ।।1
यत्र   द्वाविव   जघनाधिषवण्या  कृता।  उलूखलसुतानामवेद्विंद्र  जल्गुल: ।।2
यत्र   नार्यपच्यवमुपच्यवं  च   शिक्षते।  उलूखलसुतानामवेद्विंद्र   जल्गुल: ।।3
यत्र मन्थां  विबध्नते रश्मीन् यमितवा इव। उलूखलसुतानामवेद्विंद्र  जल्गुल: ।।4
यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे। इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभि:।।5।।25

अर्थ–हे इंद्र! जहां कूटने के लिए दृढ़ पत्थर का मूसल उठाया जाता है, वहां निष्पन्न किए सोमों का बारंबार सेवन करें। हे इंद्र!  जहां दो जंघाओं के समान सोम कूटने वाले सिल-लोढ़े अथवा दो फलक रखें हैं, उनसे तैयार किए हुए सोमरस का पान कीजिए। जहां स्त्री सोम रस तैयार करने के लिए मूसल से कूटने को डालने-निकालने का अभ्यास करती है, हे इंद्र! वहां जाकर सोम रस का सेवन कीजिए। सारथी द्वारा घोड़े को रास से बांधने की भांति जहां मंथन दंड (मथानी) को रस्सी से बांधकर मंथन करते हैं, उस स्थान को प्राप्त कर सोमरस का पान कीजिए। हे ऊखल! आप घर-घर में काम के लिए जाते हैं, फिर भी हमारे इस घर में विजय-दुंदुभि के समान शब्द करें।


उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित्। अथो इंद्राय पातवे सुनु सोममुलूखल ।।6
आयजी   वाजसातमा  ता   ह्युच्चा  विजर्भुत:।  हरी   इवान्धांसि   बप्सता ।।7
ता  नो  अद्य  वनस्पती   ऋष्वावृष्वेभि:  सोतृभि:।  इंद्राय  मधुमत्  सुतम् ।।8
उच्छिष्टं   चम्वोर्भर   सोमं   पवित्र   आ  सृज।  नि  धेहि  गोरधि  त्वचि ।।9।।26

अर्थ–हे ऊखल-मूसल वनस्पते! वायु तुम्हारे समक्ष विशेष गति से चलती है। हे ऊखल! उस इंद्र को पीने के लिए सोम सिद्ध करो। महान बल को देने वाले पूजन योग्य ये ऊखल और मूसल दोनों अन्नों का सेवन करते हुए अश्व के समान उच्च स्वर में बोलते हैं। हे ऊखल-मूसल रूप वनस्पते! तुम सोम सिद्ध करने वालों के लिए मधुर सोमों का इंद्र के निमित्त निष्पीडऩ करो। ऊखल और मूसल द्वारा कूटे गए सोम को पात्र से निकाल कर पवित्र कुश पर रखो और अवशिष्ट को चर्म पात्र में रखो।


सूक्त-29

(ऋषि-शुन शेप आजीगर्ति। देवता-इंद्र। छंद-पंक्ति)

यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।1
शिप्रिन् वाजानां पते शचीवस्तव दंसना। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।2
नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तामबुध्यमाने। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।3
ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातय:। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।4
समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापयामुया। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।5
पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।6
सर्व परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्। आ तू न इंद्र शंसय गोष्वश्वेषु सहस्रेषु तुवीमघ।।7।।27

अर्थ– हे सत्य स्वरूप सोमपायी इंद्र! यद्यपि हम निराश से हुए पड़े हैं, फिर भी आप अत्यंत सुंदर पुष्ट हजारों गाय-घोड़े देकर हमको संतुष्ट कीजिए। हे शक्तिशालिन! हे सुंदर नासिका युक्त इंद्र! आपकी दया हमें सदा मिली है। हमें हजारों गाय-घोड़े प्रदान कीजिए। हे इंद्र! परस्पर देखने वाली दोनों (विपत्ति और दरिद्रता) को अचेत कर दीजिए। वे कभी जागरणशील न रहें। हमें असंख्य गायों और अश्वों से युक्त कीजिए। हे इंद्र! हमारे शत्रु सोते रहें और मित्र जागरणशील हों। हमें सहस्रों गाय और घोड़े दीजिए। हे इंद्र! इस पापपूर्ण स्तुति करने वाले गधे के समान हमारे शत्रु को मार डालिए। हमको सहस्र संख्यक गाय और घोड़े प्रदान कीजिए। कुटिल गति वाली वायु जंगम से भी दूर रहे। आप हमें गाय, धन आदि के दाता बनें। हे इंद्र! हमारा अशुभ चाहने वाले को मार डालें, हिंसकों को नष्ट करें और असंख्य गाय व घोड़े प्रदान करें।



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