सृष्टि का विज्ञान है वेद-19

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Vedas

सृष्टि चक्र और उसका विज्ञान हमेशा से मनुष्य के आकर्षण का बड़ा केंद्र रहा है। इस पर आध्यात्म से लेकर विज्ञान तक के क्षेत्र में बहुत काम हुआ है और अभी भी हो रहा है। मैंने महसूस किया है कि इस दिशा में आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक काम हुआ है। ऋषियों ने चरम सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और उसे आम लोगों के लिए सुलझ भी कर दिया था। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि यह आध्यात्मिक सिद्धांत विज्ञान की कसौटी पर भी काफी हद तक खरा उतरता नजर आता है। यह अलग और शोध का विषय है कि दोनों सिद्धांतों में जो भिन्नता अभी नजर आती है, वह विज्ञान के शैशवकाल के कारण या आध्यात्म के क्षेत्र में और काम करने की जरूरत को इंगित करती है।


कितना गजब का संयोग है कि सृष्टि का चक्र का तादात्म जितना विज्ञान से है उतना ही भाषा से। तभी तो संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, वर्ण आदि से जैसे-जैसे जीवात्मा जुड़ता जाता है उसका स्वरूप बदलता जाता है। वैसे ही कहने को तो पंथ अलग -अलग हैं लेकिन मूल एक ही है जो पंच तत्वों के मिलकर बना है जो प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्सटीन की थ्योरी का आधार भी है और उसे प्रमाणित भी करता है। इन मंत्रों में मुख्य रूप से सूर्य और अग्नि की स्तुति की गई है। दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें पुन: अग्नि को देवताओं के लिए माध्यम के रूप में माना गया है जो इसका स्पष्ट संकेत है कि पूर्व में देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया मंत्र किसी विद्वान द्वारा अलग से जोड़ा गया था। इसमें अग्नि को युवा और सौभाग्यशाली कहा गया है। साथ ही इसका भी स्पष्ट जिक्र है कि उन्हें पहले के ऋषि मेघातिथि और कण्व ने प्रज्ज्वलित किया था। ये सारी बातें पाखंडियों एवं भ्रम में भरे लोगों के लिए आंखें खोलने वाला है। इस अंक में सूक्त 35 और 36 के मंत्र हैं।


सूक्त-35

(ऋषि-हिरण्यस्तूप, अंगिरस। देवता-अग्नि मित्रावरुण, प्रकृति। छंद-जगती, त्रिष्टुप, पंक्ति।)

ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे। ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये।।1
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्थ्यं च। हिरण्येन सविता रथेनास्स् देवो याति भुवनानि पश्यन्।।2
याति देव: प्रवता यात्युद्वता याति शुभ्राभ्यां यजतो हरिभ्याम्। आ देवो याति सविता परावतो स्प विश्वा दुरिता बाधमान:।।3
अभिवृतं कृशनैर्विश्वरूपं हिरण्यशभ्यं यजतो बृहन्तम्। आस्थाद् रथं सविता चित्रभानु: कृष्णा रजांसि तविषीं दधान:।।4
वि जनांछ्यावा: शितिपादो अख्यन् रथं हिरण्यप्रउगं वहन्त:। शश्वद् विश: सविदुर्दैव्यस्योपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थु:।।5
तिस्रो द्याव: सवितुर्द्वा उपस्थां एका यमस्य भुवने विराषाट्। अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत्।।6।।6

अर्थ–मैं अपने कल्याण के लिए अग्नि, मित्र और वरुण का आह्वान करता हूं। प्राणियों को विश्राम देने वाले रात्रि और सूर्य देवता का मैं रक्षा के लिए आह्वान करता हूं। अंधकारपूर्ण समय में भ्रमण करते हुए प्राणियों को चैतन्य करने वाले सूर्य हमें सोने के रथ से प्राप्त होते हैं। वे सूर्य देवता अंधकारादि का नाश करते हुए नीचे या ऊंचे मार्गों पर श्वेत अश्वों से युक्त रथ पर दूर से आते हुए गमन करते हैं। पूज्य एवं अद्भुत रश्मियों से युक्त सूर्य स्वर्ण साधनों से युक्त रथ पर चढ़कर अंधकारयुक्त लोकों के लिए शक्ति को धारण करते हैं। श्वेत आश्रम वाले, जुओं को बांधने वाले स्नानयुक्त रथ को चलाते हुए सूर्य के अश्वों ने मनुष्यों को प्रकाश दिया है। सब प्राणी और लोक सूर्य के अंग में ही स्थित हैं। तीनों लोकों में पृथ्वी सूर्य के समीप है। एक अंतरिक्ष यमलोक का द्वार रूप है। रथ के पहिए की अगली कील पर अवलंबित रहने के समान सभी नक्षत्र सूर्य पर अवलंबित हैं।


वि सुपर्णो अंतरिक्षाण्यख्यद् गंभीरवेपा असुर: सुनीथ:। क्वे दानीं सूयर्: कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान।।7
अष्टौ व्यख्यत् ककुभ: पृथिव्यास् त्री धन्व योजना सप्त सिंधून्। हिरण्याक्ष: सविता देव आगाद् दधद्रत्रा दाशुषे वार्याणि।।8
हिरण्यपाणि: सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अंतरीयते। अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति।।9
हिरण्यहस्तो असुर: सुनीथ: सुमृलोक: स्ववाँ यात्वर्वाङ्। अपसेधन् रक्षसो यातुधानानस्थाद् देव: प्रतिदोषं गृणान:।।10
ये ते पंथा: सवित: पूर्व्यासो स्रेणव: सुकृता अंतरिक्षे। तेभिर्नो अद्य पथिभि: सुगेभी रक्ष च नो अधि च ब्रूहि देव।।11।।7

अर्थ–गंभीर, कंपनयुक्त, सुंदर व प्राणयुक्त सविता ने अंतरिक्ष को प्रकाशित किया है। वह सूर्य कहां रहते हैं, उनकी किरणें किस आकाश में व्याप्त रहती हैं—यह कौन कह सकता है? सूर्य ने पृथिवी की आठों दिशाओं को मिलाने वाले तीनों कोणों और सात समुद्रों का प्रकाशित किया है। स्वर्णिम नेत्र वाले सूर्य साधक को धन देने के लिए यहां आएं। सोने के हाथ वाले सर्वद्रष्टा सूर्य आकाश और पृथिवी के मध्य गति करते हैं। वे रोगादि बाधाओं को मिटाकर अंधकारनाशक तेज से आकाश को व्याप्त कर देते हैं। सुवर्णापाणि, प्राणवान, श्रेष्ठ, कृपालु एवं ऐश्वर्यवान सूर्य हमारे सामने आएं। वे नित्य राक्षसों का दमन करते हुए यहां ठहरें। हे सूर्य! आकाश में आपका धूलरहित पुरातन मार्ग सुनिर्मित है। इन मार्गों से आकर हमारी रक्षा कीजिए। जो मार्ग हमारे अनुकूल है, हमें उसका ज्ञान दीजिए।


सूक्त-36

(ऋषि-कण्व घोर।  देवता अग्नि।  छंद-बहती आदि)

प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम्। अग्निं सूक्तेभिर्वचोभिरीमहे यं सीमिदन्य ईलते।।1
जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मंतो विधेम ते। स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य।।2
प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानव:।।3
देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिन्धते। विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मर्त्य:।।4
मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि। त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत।।5।।8

अर्थ–हे मनुष्यों! तुममें  से अधिकतर देवताओं की कामना करते हो। तुम्हारे निमित्त मैं उन महान अग्नि की सूक्त वचनों द्वारा प्रार्थना करता हूं। उनकी अन्य लोग भी स्तुति करते हैं। मनुष्यों ने जिस प्रकार बलवर्द्धक अग्नि को धारण किया है, हम उन्हें हवियों से तृप्त करें। दानी! आप प्रसन्न होकर इस युद्ध में हमारी रक्षा करें। हे संपूर्ण ऐश्वर्य वाले देवदूत और होता! हम आपका वरण करते हैं। आप महान और सत्य रूप हैं। आपकी लपटें आकाश की ओर उठती हैं। हे अग्ने! पुरातन पुरुष को वरुण, मित्र और अर्यमा प्रदीप्त करते हैं। आपको हवि देने वाला साधक सभी धनों को प्राप्त करता है। हे अग्ने! आप प्रसन्न करने वाले, प्रजाओं के स्वामी, गृहपालक और देवदूत हैं। देवताओं के सभी कार्य आपसे मिलते हैं।


त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हवि:। स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या।।6
तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते। होत्राभिरग्नं मनुष: समिन्धते तितिर्वांसो अति स्रिध:।।7
घ्नन्तो वृत्रमतरन् रोदसी अप उरू क्षयाय चक्रिरे। भुवत कण्वे वृषा द्युम्न्याहुत: क्रन्ददश्वो गविष्टिषु।।8
सं सीदस्व महां असि शोचस्व देववीतम:। वी धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्।।9
यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुत:।।10।।9

अर्थ–हे युवा अग्ने! आप सौभाग्यशाली हैं क्योंकि आपमें ही सारी हवियां डाली जाती हैं। आप प्रसन्न होकर आज और आगे भी हमारे लिए देवताओं का पूजन कीजिए। नमस्कार करने वाले व्यक्ति स्वयं प्रकाशित अग्नि की पूजा करते हैं। शत्रु से डरे हुए मनुष्य स्तुतियों द्वारा अग्नि को प्रदीप्त करते हैं। देवताओं ने प्रहारपूर्वक वृत्र को जीता और तीनों लोकों का विस्तार किया। अभीष्ट वर्षक अग्नि आह्वान करने पर मुझ कण्व को गौ आदि धन प्रदान करें। हे अग्ने! आइए और विराजमान होइए। देवताओं को जानने वाले आप चैतन्य हैं। उत्तम लालिमा लिये सुंदर धुएं को फैलाइए। हे हविवाहक अग्ने! आप पूजने योग्य को देवताओं ने मनु के निमित्त इस लोक में स्थापित किया। आप धन से संतुष्ट करने वाले को कण्व और मेघातिथि ने वृषा और उपस्तुत ने धारण किया।


यमग्निं मेघ्यातिथि: कण्व ईध ऋतादधि। तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस् तमग्निं वर्धयामसि।।11
रायस्पूर्धि स्वधावोस्स्ति हि तेस्ग्ने देवेष्वाप्यम्। त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृल महां असि।। 12
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता। ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे।।13
ऊर्ध्वो न: पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह। कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुव:। ।14
पाहि नो अग्ने रक्षस: पाहि धूर्तेरराव्ण:। पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य।।15।।10

अर्थ–जिस अग्नि को मेघातिथि और कण्व ने प्रज्ज्वलित किया, वह अग्नि दीप्तिमान है। इन ऋचाओं द्वारा हम उस अग्नि को बढ़ाते हैं। हे अन्नवान अग्ने! हमारे भंडार भरें। आप देवताओं के मित्र और ऐश्वर्य के स्वामी हैं। हे महान!  हम पर कृपा कीजिए। आप हमारी रक्षा के लिए ऊंचे खड़े होइए। आप उन्नत शक्ति के प्रदाता हैं। हम विद्वानों के सहयोग से आपका स्तवन करते हैं। आप उन्नत हुए पाप से हमारी रक्षा कीजिए। मनुष्य भक्षकों को भष्म कर हमें जीवन में प्रगति के लिए ऊंचा उठाइए। हमारे कार्यों को देवताओं के प्रति निवेदित कीजिए। हे अग्ने!  हमारी दैत्यों से रक्षा कीजिए। दान करने वालों को बचाइए। आप महान दीप्ति वाले, पूर्ण युवा और हिंसकों से रक्षा करने वाले हैं, हमारी रक्षा कीजिए।


घनेन विष्वग्वि जह्यराव्णस् तपुर्जम्भ यो अस्मध्रुक्। यो मर्त्य: शिशीते अत्यक्तुभिर्मा न: स रिपुरीशत।।16
अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्नि: कण्वाय सौभगम्। अग्नि: प्रावन् मित्रोत मेध्यातिथिमग्नि: साता उपस्तुतम्।।17
अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे। अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुवींतिं दस्यवे सह:।।18
नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते। दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यंति कृष्टय:।।19
त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये। रक्षस्विन: सदमिद् यातिमावतो विश्वं समत्रिणं दह।।20।11

अर्थ– हे संताप देने वाले दाढ़ों वाले अग्नि देव!  दृढ़ सोटे से मारने के समान दान न देने वाले को मारें। हमारे द्रोहियों और रात में हमारे शस्त्र पैनाने वालों के आधिपत्य को रोकें। अग्नि ने मेरे लिए सौभाग्य की इच्छा की। उन्होंने मेघातिथि और उपस्तु की धन प्राप्ति के लिए रक्षा की। तुर्वशु, यदु और उग्रदेव को अग्नि के साथ दूर बुलाते हैं। वे नावस्त्व, बृहद्रथ और तुवीति को भी यहां बुलाएं। हे ज्योतिर्मान अग्ने! आपको मनुष्यों के लिए मनु ने स्थापित किया। आप यज्ञ के लिए प्रकट होकर हवि से तृप्त होइए। साधक आपको नमस्कार करते हैं। अग्नि की प्रदीप्त ज्वालाएं बलवती और उग्र होती हैं। उनका सामना नहीं किया जा सकता। हे अग्ने! आप रक्षसों और मनुष्य भक्षियों को भष्म कीजिए।



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