सृष्टि का विज्ञान है वेद-6

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निम्न मंत्रों की खास बात यह है कि इसमें अग्नि को देवता नहीं, बल्कि उनके दूत के रूप में संबोधित किया गया है। हां, साथ ही उन्हें धन, पुत्र और अन्न प्रदान करने में सक्षम भी कहा गया है। लेकिन इसमें उनकी भूमिका मुख्य रूप से देवताओं को यज्ञ में लाने तथा यज्ञ में सहायक के रूप में है। इसी निमित्त उनकी प्रार्थना की गई है। बाद के धर्मग्रथों का अध्ययन करें तो उसमें अग्नि को भी पूर्ण देवता का दर्जा दिया गया है। निम्न मंत्रों में पुन:  इंद्र की ही सबसे ज्यादा प्रशंसा और स्तुति की गई है। उन्हें महादानी, मायावी, कभी न हारने वाले, दुर्गों का भेदन करने वाले, युवा, महाबली कहते हुए उनसे मित्रता की भी प्रार्थना की गई है। इस कड़ी में सूक्त दस से सूक्त बारह तक के मंत्र हैं।


सूक्त- 10

(ऋषि-मधुच्छंदा वैश्वामित्र। देवता-इंद्र। छंद-गायत्री)

गायंती त्वा गायत्रिणोस्र्चन्त्यर्कमर्किण:। ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद् वंशमिव येमिरे।।1।।
यत् सानो: सानुमारुहद् भूर्यस्पष्ट कर्त्वम्। तदिंद्रो अर्थ चेतति यूथेन वृष्णिरेचति।।2।।
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा। अथा न इंद्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर।।3।।
एहि स्तोमाँ अभि स्वरास्भि गृणीह्मा रुव। ब्रह्म च नो वसो सचेंद्र यज्ञं च वर्धय।।4।।
उक्थमिंद्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे। शक्रो यथा शुतेषुणो रारणत् सख्येषु च।।5।।
तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये। स शक्र उत न: शकदिंद्रो वसु दयमान:।।6।।19

अर्थ–हे शतकर्मा इंद्र! गायक आपका यशा गाते, पूजने वाले पूजते और स्तोता अपनी स्तुतियों से आपको उन्नत करते हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले यजमान से अभीष्ट के ज्ञाता इंद्र मरुद्गण सहित अभीष्ट वर्णन के निमित्त यज्ञ में पहुंचते हैं। हे सोमपायी इंद्र! बालों वाले अश्वों को अपने रथ में जोतकर हमारी स्तुति सुनने के लिए आइए। हे इंद्र! यहां आकर हमारी स्तुतियों का अनुमोदन करें। हमारे साथ गाइए और हमारे कार्यों को अनुमोदन करते हुए वृद्धिकारक बनें। शत्रु संहाकर इंद्र के निमित्त स्तुतियों का गान करो, जिससे वह हम सबके बीच आकर हर्षध्वनि करें। मित्रता, धन प्राप्ति और सामर्थ्य के लिए हम इंद्र से ही याचना करते हैं। वही इंद्र हमको धनवान और बलवान बनाते हुए हमारी रक्षा करते हैं।


सविवृतं सुनिरजमिंद्र त्वादातमिद्यश:। गवामप वज्रं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिव:।।7।।
नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वत:। जेष: स्वर्वतीरप: सं गा अस्मभ्यं धूनुहि।।8।।
आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नू चिद्दधिष्व मे गिर:। इंद्र स्तोभमिमं मम कृष्वा युजश्चिदंतरम्।।9।।
विद्या ही त्वा वृषंतमं वाजेषु हवनश्रुतम्। वृषंतमस्य हूमह ऊतिं सहस्रसातमाम्।।10।।
आ तू न इंद्र कौशिक मंदसान: सुतं पिब। नव्यमायु: प्र सूतिर कृधी सहस्रसामृषिम्11
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवंतु विश्वत:। वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवंतु जुष्टय:।।12।।20

अर्थ– हे इंद्र! आपका दिया हुआ यश सब ओर फैल गया है। हे वज्रिन! गौशालाओं को खोलकर हमें बहुत सा गो धन प्राप्त कराइए। हे इंद्र! आपकी क्रोधित अवस्था में आकाश या पृथ्वी कोई भी आपको धारण करने में समर्थ नहीं होते। आप आकाश से वृष्टि करें और हमें गायें दें। हे सबकी स्तुति सुनने वाले इंद्र! मेरी भी स्तुति सुनें और इन्हें स्वीकार करें। इन स्तोत्रों को मित्र से भी अधिक निकटस्थ मानें। हे इंद्र! हम भी जानते हैं कि आप महान पुरुषार्थी हैं। आप युद्धकाल में हमारी स्तुतियों को सुनते हैं। हे अभीष्टसाधक! अपनी रक्षा के लिए हम आपका आह्वान करते हैं। हे कुशिक के पुत्र! आप निष्पन्न सोम को पीने के लिए यहां आइए। मेरी आयु में वृद्धि करते हुए इस ऋषि को सहस्र संख्यक धन का स्वामी बनाइए। हे स्तुत्य इंद्र! हमारी ये स्तुतियां आपके सब ओर व्याप्त हैं। आप बढ़ी हुई आयु वाले हों। इन स्तुतियों से आपकी प्रीति हो।


सूक्त-11

(ऋषि-जेता माधुच्छंदस। देवता-इंद्र। छंद-अनुष्टुप)

इंद्रं विश्वा अवीवृधंत् समुद्रव्यचसं गिर:। रथीतमं  रथीनां  वाजानां  सत्पतिं पतिम् ।।1
सख्ये त इंद्र वाजिनो मा भेम शवस्पते। त्वामभि  प्र णोनमो     जेतारमपराजितम् ।।2
पूर्वीरिंद्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतय:। यदी वाजस्य गोमत: स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ।।3
पुरां बिंदुर्युवा कविरमितौजा आजयत्। इंद्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुत: ।।4
त्वं वलस्य गोमतो स्पावरद्रिवो बिलम्। त्वां देवा अबिभ्युषस् तुज्यमानास आविषु ।।5
तवाहं शूर रतिभि: प्रत्यायं सिंधुमावदन्। उपातिष्ठंत गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारव: ।।6
मयाभिरिंद्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिर:। विदुष्टे तस्ये मेधिरास् तेषां श्रवांस्युत्तिर ।।7
इंद्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत। सहस्रं यस्य रातय उत वा संति भूयसी: ।।8।।21

अर्थ–अंतरिक्ष के समान विशाल, रथियों में श्रेष्ठ, अन्न के स्वामी तथा उपासकों की रक्षा करने वाले इंद्र को हमारे स्तोत्र बढ़ाते हैं। हे बल के स्वामी इंद्र! आपकी मित्रता हमारे भय को दूर कर हमें शक्तिशाली बनाए। आप सदा विजय प्राप्त करते हैं। हम आपका स्तवन करते हैं। इंद्र का दान विख्यात है। स्तोताओं को गवादि धन तथा बल देने वाले इंद्र साधकों को निरंतर देते ही रहते हैं। इंद्र, स्तुत्य दुर्गों का भेदन करने वाले, युवा, मेधावी, महाबली, कर्मों के करने वाले, वज्रधारी प्रकट हुए। हे वज्रिन! वृत्र की गौवों वाली गुफा के खोले जाने पर पीड़ित देवताओं ने आपसे अभय प्राप्त किया। हे इंद्र! निष्पन्न सोम का गुण सबको बताकर आपके धनदान के प्रभाव से फिर आया हूं। हे स्तुत्य इंद्र! आपने अपनी माया से ही उस मायावी दुष्ट पर विजय पायी है। आपकी इस महिमा को जो बुद्धिमान जानते हैं, उनकी वृद्धि कीजिए। अपने बल से संसार पर शासन करने वाले इंद्र का स्तोताओं ने यशगान किया। हे सहस्रों प्रकार से भी अधिक ऐश्वर्य के दाता हैं।


सूक्त-12 (चौथा अनुवाक)

(ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता-अग्नि। छंद-गायत्री)

अग्निं  दूतं  वृणीमहे  होतारं  विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ।।1
अग्निमग्निं हवीमभि: सदा हवन्त विश्वपतिम्। हव्यवाहंस पुरुप्रियम् ।।2
अग्ने  देवाँ  इहा  वह  जज्ञानो  वृक्तबर्हिषे। असि  होता न ईड्य: ।।3
ताँ  उशतो  वि  बोधय  यदग्ने यासि दूत्यम्। देवैरा सत्सि बर्हिषि ।।4
घृताहवन  दीदिव:  प्रति ष्म  रिषतो  दह। अग्ने  त्वं  रक्षस्विन: ।।5
अग्निनाग्नि:  समिध्यते  कविर्गूहपतिर्युवा।  हव्यवाड् जुह्वास्य: ।।6।।22

अर्थ–हम देवदूत, आह्वानकर्ता, सब ऐश्वर्यों के स्वामी, यज्ञ के संपादन करने वाले अग्नि का वरण करते हैं। प्रजा पालक हविवाहक बहुतों के प्रिय अग्नि का मंत्रों द्वारा यजमान आह्वान करते हैं। हे अग्ने! कुश बिछाने वाले यजमान के लिए प्रदीप्त हुए आप देवताओं को बुलाएं, क्योंकि आप हमारे पूज्य होता हैं। हे अग्ने! आप देवताओं के दौत्यकर्म में नियुक्त हैं, इसलिए हव्य चाहने वाले देवताओं को बुलाएं और उनके साथ इस कुशासन पर प्रतिष्ठित हों। हे दैदीप्यमान अग्ने! आप घृत से पवित्र हुए हमारे शत्रुओं को भस्म करें। मेधावी, गृहरक्षक, हविवाहक और जूहू मुख वाले अग्नि को अग्नि से ही प्रज्वलित करते हैं।


कविमग्निमुप   स्तुहिं    सत्यधर्माणमध्वरे।  देवममीवचातनम् ।।7
यस्त्वामग्ने  हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति। तस्य स्म  प्राविता भव ।।8
यो अग्निं  देववीतये हविष्माँ आविवासति। तस्मै  पावक मृलय ।।9
स न: पावक  दीदिवो स्ग्ने  देवाँ इहा वह। उप यज्ञं  हविश्च न: ।।10
स न: स्तवान आ भर गायत्रेण  नवीयसा। रयिं  वीरवतीमिषम् ।।11
अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभि:। इमं स्तोमं जुषस्व न: ।।12।।23

अर्थ–मेधावी, सत्यनिष्ठ, शत्रुनाशक अग्नि की यज्ञ कर्म में निकट से स्तुति करो। हे अग्ने! आप देवदूत की सेवा करने वाले यजमान की रक्षा करते हैं। हे पावक! जो यजमान हवि देने के लिए अग्नि के समीप जाकर उपासना करे, उसका कल्याण करें। हे पवित्र अग्ने! आप प्रदीप्त हुए हमारे यज्ञ में हवि ग्रहण करने के लिए देवताओं को यहां लाइए। हे अग्ने! नवीन स्तोत्रों से स्तुति किए जाते हुए आप हमें धन, पुत्र और अन्न प्रदान करें। हे अग्ने! आप कांति वाले देवताओं को बुलाने में सक्षम हैं। आप हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करें।



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