सृष्टि का विज्ञान है वेद-10

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सूक्त 20 से 22 तक के वेद मंत्रों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उस दौर में विज्ञान काफी उन्नत था। इंद्र के कहने भर से जुड़ने वाले अश्वों की रचना की गई थी। इसमें इसका भी स्पष्ट जिक्र है कि पहले वृद्धों को युवा बनाने का ज्ञान कुछ लोगों के पास था। हालांकि यह सबके लिए सुलभ नहीं था। जैसे ऋभुओं ने अपने माता-पिता को पुन: युवा अवस्था दी। नीचे के मंत्र से यह भी साफ होता है कि वे देवता नहीं थे लेकिन उन्होंने नाश न होने वाली आयु प्राप्त कर ली थी और अपनी योग्यता के बल पर देवताओं के साथ रहने लगे थे। यह न सिर्फ भारतीय लोगों के लिए गौरव की बात है, बल्कि इस बात का प्रमाण भी है कि चिर युवावस्था संभव है। हिमालय में अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों ने अद्भुत जड़ी-बूटियों के मिलने और उसके निजी लाभ की जानकारी दी है लेकिन दुर्भाग्य से इस दिशा में अब तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इसके अंतिम क्रम में विष्णु का भी जिक्र किया गया है और उन्हें महान बनाया गया है लेकिन अबतक के मंत्रों के क्रम और भाव के अवलोकन से यह मंत्र प्रथमदृष्टया ही बाद में जोड़ा गया प्रतीत होता है।


सूक्त-20 (पांचवां अनुवाक)

(ऋषि-मेघातिथि काण्व। देवता-ऋभव। छंद-गायत्री)

अयं देवाय जन्मने  स्तोमो  विप्रेभिरासया। अकारि रत्नधातम: ।।1
य  इंद्राय   वचोयुजा   ततक्षुर्मनसा  हरी।  शमीभिर्यज्ञमाशत ।।2
तक्षन् नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम्। तक्षन् धेनुं सबर्दुधाम् ।।3
युवाना  पितरा  पुन:  सत्यमंत्रा  ऋजूयव:। ऋभवो विष्ट्यक्रत ।।4
सं वो मदासो अग्मतेंद्रेण च मरुत्वता। आदित्येभिश्च राजभि: ।।5।।1

अर्थ–विद्वानों ने यह स्तोत्र ऋभु देवों के निमित्त रमणीक छंद में रचा है। जिन ऋभुओं ने अपने मन से इंद्र के वचन मात्र से जुत जाने वाले अश्वों की रचना की, वे हमारे यज्ञ में स्वत: ही व्याप्त हैं। उन्होंने अश्विनीकुमारों के लिए सुख देने वाले रथ की रचना की। दूध रूप अमृत देने वाले धेनु को बनाया। सत्याशय, सरल स्वभाव वाले स्नेही और नि:स्वार्थी ऋभुओं ने अपने माता-पिता को पुन: युवावस्था दी। हे इंद्र! मरुद्गण और आदित्य के साथ आपके निमित्त यह सोमरस प्रस्तुत है।


उत  त्यं  चमसं  नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम्। अकर्त चतुर: पुन: ।।6
ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते। एकमेकं सुशस्तिभि: ।।7
आधारयंत  वह्नयो ह्यभजंत  सुकृत्यया।  भागं   देवेषु  यज्ञियम् ।।8।।2

अर्थ–त्वष्टा ने जो नया चमस पात्र प्रस्तुत किया था, ऋभुओं ने उसके स्थान पर चार चमस बना दिए। उत्तम प्रकार से स्तुति किए जाते हुए ऋभुगण सोम सिद्ध करने वाले यजमान को एक-एक कर इक्कीस रत्न प्रदान करें। ऋभुगण अविनाशी आयु प्राप्त कर देवताओं के मध्य रहते हुए यज्ञ भाग प्राप्त करते हैं।


सूक्त-21

(ऋषि-मेघातिथि काण्व। देवता-इंद्र और अग्नि। छंद-गायत्री)

इहेन्द्राग्नी उप ह्वये तयोरित् स्तोममुश्मसि। ता सोमं सोमपातमा ।।1
ता  यज्ञेसु  प्र  शंसतेन्द्राग्नी  शुंभता  नर:। ता गायत्रेषु  गायत ।।2
ता  मित्रस्य  प्रशस्तय  इंद्राग्नी  ता  हवामहे। सोमपा सोमपीतये ।।3
उग्रा  संता  हवामह  उपेदं  सवनं  सुतम्। इंद्राग्नी एह गच्छताम् ।।4
ता महान्ता सदस्पती इंद्राग्नी  रक्ष उब्जतम्। अप्रजा:  सन्त्वत्रिण: ।।5
तेन  सत्येन  जागृतमधि  प्रचेतुने  पदे। इंद्राग्नी  शर्म  यच्छतम् ।।6।।3

अर्थ–इंद्र और अग्नि का इस यज्ञ स्थान में आह्वान करता हूं। उन्हीं का स्तवन करता हुआ सोम-पान के लिए दोनों से निवेदन करता हूं। हे मनुष्यों! इंद्र और अग्नि का स्तवन करो, उन्हें अलंकृत कर स्तोत्र गान करो। इंद्र और अग्नि को मित्र की प्रशंसा एवं सोमपान करने के लिए आमंत्रित करते हैं। उग्र देव इंद्र और अग्नि का सोम याग में आह्वान करते हैं। वे दोनों यहां पधारें। हे महान समाज की रक्षा करने वाले इंद्र और अग्नि! आप दोनों दुष्टों को वशीभूत करें। मनुष्य-भक्षी दैत्य संतानहीन हों। हे इंद्राग्ने! उस सत्य चैतन्य यज्ञ के निमित्त जागकर हमको आश्रय दें।


सूक्त-22

(ऋषि-मेघातिथि काण्व। देवता-अश्विन और प्रभृति। छंद-गायत्री)

प्रातर्युजा वि  बोधयाश्विनावेह  गच्छताम्। अस्य सोमस्य पीतये ।।1
या  सुरथा  रथीतमोभा  देवा  दिविस्पृशा  अश्विना ता हवामहे ।।2
या वां कशा मधुमत्यश्विना  सूनृतावती। तया  यज्ञं मिमिक्षतम् ।।3
नहि वामस्ति दूरके यात्रा रथेन गच्छथ:। अश्विना सोमिनो गृहम् ।।4
हिरण्यपाणिमूतये  सवितारमुप  ह्वये। स  चेत्ता  देवता  पदम् ।।5।।4

अर्थ–हे अग्ने! प्रात:काल सचेत होने वाले अश्विनीकुमारों को यज्ञ में आने के लिए जगाओ। वे दोनों सुशोभित रथ से युक्त अतिरथी तथा आकाश को छूने वाले हैं। हम उनका आह्वान करते हैं। हे अश्विनीकुमारों! आप दोनों को मधुर, प्रिय और सत्य रूप जो चाबुक है, उसके साथ आकर यज्ञ को सींचें। हे अश्विनीकुमारों! आप दोनों जिस मार्ग से प्रस्थान करते हैं, उससे सोम वाले यजमान का घर दूर नहीं है। मैं उस स्वर्ण हस्त वाले सूर्य का आह्वान करता हूं, वे यजमान को उचित प्रेरणा देंगे।


अपां    नपातमवसे   सवितारमुप  स्तुहि।  तस्य   व्रतान्युश्मसि ।।6
विभक्तारं   हवामहे   वसोश्चित्रस्य   राधस:। सवितारं  नृचक्षसम् ।।7
सखाय आ नि षीदत सविता स्तोभ्यो नु न:। दाता राधांसि शुम्भति ।।8
अग्ने   पत्नीरिहा   वह   देवानामुशतीरूप।  त्वष्टाकं   सोमपीतये ।।9
आ ग्ना  अग्न  इहावसे  होत्रां  यविष्ठ भारतीम्। वरूत्रीं धिषणां वह ।।10।।5

अर्थ–जलों को आकर्षित करने वाले सूर्य को रक्षण के लिए आमंत्रित कर हम यज्ञ करने की इच्छा करते हैं। धनैश्वर्य को बांटने वाले, मनुष्यों के द्रष्टा सूर्य का आह्वान करते हैं। हे मित्रों! सब ओर बैठकर धनदाता सूर्य की स्तुति करो। वे अत्यंत सुशोभित हैं। हे अग्ने! अभिलाषा वाली देव पत्नियों को यज्ञ में लाइए। सोमपान के लिए त्वष्टा को यहां ले आइये। हे युवावस्था प्राप्त अग्ने! हमारे रक्षण के लिए होत्रा, भारती, वरूत्री और धिषणा देवियों को यहां लाइए।


अभि नो देवीरवसा मह: शर्मणा नृपत्नी:। अच्छिन्नपत्रा: सचन्ताम् ।।11
इहेन्द्राणीमुप   ह्वये   वरुणानीं  स्वस्तये।  अग्नायीं  सोमपीतये ।।12
मही द्यौ: पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभि: ।।13
तयोरिद्  घृतवत्  पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभि:। गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ।।14
स्योना  पृथिवि  भवानृक्षरा  निवेशिनी। यच्छा  न:  शर्म  सप्रथ: ।।15।।6

अर्थ–वीर पत्नी, द्रुतगामिनी देवियां अमर रक्षण सामर्थ्यों से हमको आश्रय प्रदान करें। अपने मंगल के लिए इंद्राणी, वरुण पत्नी और अग्नि की पत्नी का सोम पीने के लिए आह्वान करता हूं। महान आकाश और पृथिवी ऐसे यज्ञ को सींचने की कामना करते हुए हमको पोषण-सामर्थ्य प्रदान करें। आकाश, पृथिवी के मध्य गंधर्वों के स्थान में ज्ञानीजन ध्यान से घी के समान जल पीते हैं। हे पृथिवी! आप सुखदायिनी, बाधारहित और उत्तम वास देने वाली हो। आप हमें आश्रय प्रदान करें।
अतो देवा अवंतु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे। पृथिव्या: सप्त धामभि: ।।16


इदं  विष्णुर्वि  चक्रमे  त्रेधा  नि  दधे पदम्। समूह्लमस्य पांसुरे ।।17
त्रीणि  पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्य:। अतो धर्माणि धारयन् ।।18
विष्णो:  कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इंद्रस्य युज्य: सखा ।।19
तद्  विष्णो:  परमं पदं सदा पश्यंति सूरय:। दिवीव  चक्षुराततम् ।।20
तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांस: समिन्धते। विष्णोर्यत् परमं पदम् ।।21।।7

अर्थ–जिस सप्त स्थान वाली पृथिवी पर विष्णु ने पद-क्रमण किया उसी पृथिवी पर देवगण हमारी रक्षा करें। विष्णु ने इस संसार को तीन पांव रखकर विक्रम किया। उनके धूल लगे पैर में ही पूरी सृष्टि समा गई। सबके रक्षक, किसी से धोखा न खाने वाले, नियम पालक विष्णु ने तीन पैर रखे। विष्णु के पराक्रम को देखो, जिनके बल से सभी नियम स्थित हैं। वे इंद्र के साथी और मित्र हैं। आकाश की ओर विस्तारपूर्वक देखने वाला नेत्र विष्णु के परमपद को देखना चाहता है। ज्ञानीजन उस पद को निरंतर अपने हृदय में देखते हैं। विष्णु के सर्वोच्च पद को स्तुति करने वाले चेतन, ज्ञानीजन भले प्रकार प्रकाशित करते हैं।



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