सृष्टि का विज्ञान है वेद-18

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जप में नहीं करें ये भूल, तभी मिलेगा पूरा फल
जप में नहीं करें ये भूल, तभी मिलेगा पूरा फल।

ब्रह्मांड के सारे काम प्रकृति के नियम से ही संचालित होते हैं। प्रकृति के नियम के खिलाफ कुछ भी संभव नहीं है। धर्मग्रंथों से लेकर विज्ञान तक में प्रकृति के सम्मान, रक्षा और उसके नियम पालन की ही बात की गई है। विघ्नहर्ता गणेश के कटे सिर के लिए प्राकृतिक उपाय (शल्य क्रिया से उपलब्ध सिर को जोड़ना) ही किया गया। सर्वशक्तिमान ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं आदि शक्ति के द्वारा भी जले सिर को पुन: प्राप्त करने जैसी अप्राकृतिक बात नहीं की गई। विज्ञान के क्षेत्र में हवाई जहाज, बिजली, टीवी, मोबाइल आदि जितने आविष्कार हुए सब प्रकृति के नियम के अनुरूप हैं।


कार्यकारिणी नियम है आधार  :  प्रकृति का कार्यकारिणी नियम सबसे महत्वपूर्ण है। इस नियम से हमारा पूरा जीवन संचालित होता है। हमारे जीवन में कुछ भी संयोगवश या अचानक नहीं होता है। जीवन हमारे विचार, भावना एवं कार्यों की प्रतिक्रिया भर करता है। देने की हर क्रिया पाने की प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। जो देते हैं, वह हमारी ओर अवश्य लौटता है।


हम जो देते हैं, वही वापस लौटता है  : हम एक चुंबक की तरह हैं जिसकी शक्ति प्रेम व आकर्षण है। हम हर पल प्रकृति में सकारात्मकता या नकारात्मकता देते हैं। हम जो विचार, भावना या वस्तु किसी को देते हैं, वही इस नियम के तहत लौटकर हमारे पास आता है। प्रेम के आकर्षण के नियम को दर्पन, गूंज, या फोटोकॉपी मशीन जैसा समझें और तदनुसार आचरण करें तो मनचाहा परिणाम मिलेगा। यह बात सिर्फ हिंदू धर्म ग्रंथों एवं हमारे ऋषि-मिनु ने ही नहीं, अन्य धर्म गुरुओं, यहां तक कि ईसा मसीह ने भी कहा है—दोगे तो तुम्हें भी मिलेगा। तुम्हारे पैमाने के हिसाब से ही तुम्हें प्रतिदान मिलेगा।


ऋग्वेद के सूक्त 33 और 34 के मंत्रों में इंद्र और अश्विनीकुमारों की स्तुति की गई है। जाहिर है कि दोनों के प्रति प्रचंड सकारात्मक भाव रखते हुए उनसे हरसंभव सहयोग का विश्वास जताया गया है। यह प्रकृति की शक्ति के दोहन का अद्भुत तरीका है। आप खुद छोटे स्तर पर ही इसका प्रयोग कर देखें। इसके लिए आप किसी भी व्यक्ति का चयन कर उसके प्रति ज़बरदस्त सकारात्मकता से भरपूर भावना को प्रकृति में छोड़ों। आप पाएंगे कि कुछ ही दिनों में उस व्यक्ति का आपके प्रति रवैया आश्चर्यजनक रूप से बदलने लगा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में धर्य और अपनी मनोवृत्ति पर पूर्ण नियंत्रण आवश्यक है। यह दोनों ही चीज थोड़े से अभ्यास से ही हासिल किया जा सकता है।


सूक्त-33

(ऋषि-हिरण्यस्तूप, अंगिरस। देवता-इंद्र। छंद-त्रिष्टुप।)

एतायामोप गव्यन्त इंद्रमस्माकं सु प्रमतिं वावृधाति। अनामृण: कुविदादस्य रायो  गवां केतं परमावर्जते न:।।1
उपेदहं धनदामप्रतीतं जुष्टां न श्येनो वसतिं पतामि। इंद्र नमस्यत्रुपमेभिरर्कैयर्: स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति  यामन्।।2
नि सर्वसेन इषुधीर सक्त समर्योगा अजति यस्य वष्टि।चोष्कूयमाण इंद्र भूरि वामं मा पणिर्भूरस्मदधि प्रवृद्ध।।3
वधीहिं दस्युं धनिनं धनेनँ एकश्चरन्नुपशाकेभिरिंद्र। धनोरधि विषुणक् ते व्यायन्नयज्वान: सनका: प्रेतिमीयु:।।4
परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इंद्रास्यज्वानो यज्वभि: स्पर्धमाना:। प्र यद्  दिवो  हरवि: स्थातरुप्र निरव्रताँ अधमो रोदस्यो:।।5।।1

अर्थ–आओ, गाय की इच्छा वाले इंद्र के समक्ष हम उपस्थित हों। हे विघ्ननाशक! हमारे धन को बढ़ाते हुए हमारी गौ की इच्छा को पूर्ण करें। जैसे युद्ध में स्तोता बुलाते हैं, वैसे इंद्र का कोई सामना नहीं कर सकता है। मैं उस धनदाता इंद्र की उपयुक्त स्तोत्रों से पूजन करता हुआ अभिलाषा करता हूं। सेना वाले इंद्र ने स्तोताओं के पक्ष में तृणोर कस लिये। प्रजाओं के स्वामी वे इंद्र गवादि धन को जीतने में समर्थ हैं। हे इंद्र! आप हमारे साथ विनिमय करने वाले न बनें। हे इंद्र! आपने अपने सहायक मरुतों के साथ भीषण वज्र से बहुत सारे धन के चोर वृत्र को मारा है। फिर उस वृत्र ने अनुचरों ने संगठित होकर आप पर आक्रमण किया पर वे अयाज्ञिक यज्ञ कर्म करने वाले के सम्मुख टिक नहीं सके और भाग गए। हे अश्वयुक्त, युद्ध में डटे रहने वाले भीषण हे इंद्र! आपने आकाश और पृथिवी पर स्थित व्रतहीनों को नि:शेष कर दिया।


अयुयुत्सन्ननवद्यस्य   सेनामयातयन्य  क्षितयो   नवग्वा:। वृषायुधो न वध्रयो निरष्टा: प्रिवद्भरिन्द्राच्चितयंत आयन्।।6
त्वमेतान्   रुदतो   जक्षतश्चायोधयो   रजस  इंद्र   पारे। आवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वत: स्तुवत: शंसमाव: ।।7
चक्राणास:  परीणहं  पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमाना:। न हिन्वानासस्तितिरुस्त  इंद्र परि स्पशो  अदधात् सूर्येण ।।8
परि  यदिंद्र  रोदसी  उभे  अबुभोजीर्महिना  विश्वत: सीम्। अमन्यमानाँ  अभि  मन्यमानैर्निर्ब्रह्माभिरधमो  दस्युमिंद्र ।।9
न  ये  दिव:  पृथिव्या अंतमापुर्न  मायाभिर्धनदां पर्यभूवन्। युजं  वज्र  वृषभश्चक्र इंद्रो निर्ज्योतिषा तसमो गा अदुक्षत् ।।10।।2

अर्थ–अयाज्ञिकों ने अनिंद्य इंद्र से लड़ने की इच्छा की। तब वीरों के साथ कायरों के युद्ध करने के समान वे खुद परास्त हुए। हे इंद्र! आपने रोते और हंसते हुए वृत्रों को युद्ध में मारा। चोर वृत्र को ऊंचा उठाकर आकाश में जलाकर गिराया। फिर आपने सोम वालों की स्तुतियों से हर्ष प्राप्त किया। उन वृत्रों ने भूमि को ढक लिया, वे स्वर्ण रत्नादि से युक्त हुए। परंतु वे इंद्र को जीत न सके। इंद्र ने उन्हें सूर्य के द्वारा भगा दिया। हे इंद्र! आपने आकाश-पृथ्वी का सब ओर से उपयोग किया। आपने अपने अनुयायियों द्वारा विरोधियों को जीता। आपकी मंत्र रूपी स्तुतियों ने शत्रु पर विजय प्राप्त की। आकाश-पृथ्वी की सीमा को मेघ प्राप्त नहीं करते और गर्जना करते हुए अंधकारादि कर्मों से सूर्य रूप इंद्र को नहीं ढक सकते परंतु इंद्र अपने सहायक वज्र से मेघ से जल को गाय के समान दुह लेते हैं।


अनु   स्वधामक्षरन्नापो  अस्यास्वर्धत  मध्य  आ  नाव्यानाम्। सध्रीचीनेन  मनसा  तमिंद्र ओजिष्ठेन  हन्मनाहन्नभि द्यून् ।।11
न्याविध्यदिलीविशस्य   दृह्ला  वि   शृंगिणमभिनच्छुष्णमिंद्र:। यावत्तरो  मघवन्  यावदोजो वज्रेण  शत्रुमवधी:   पृतन्युम् ।।12
अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून् वि तिग्मेन वृषभेणा पुरोस्भेत्। सं  वज्रेणासृजद्  वृत्रमिंद्र:  प्र  स्वां  मतिमतिरच्छाशदान: ।।13
आव:  कुत्समिंद्र  यस्मिंचाकन्  प्रावो युध्यंत वृषभं दशद्युम्। शफच्युतो   रेणुर्नक्षत   द्यामुच्छवैत्रेयो  नृषाह्याय  तस्थौ ।।14
आव:  शमं  वृषभं  तुग्न्यासु  क्षेत्रजेषे  मघवंछिवत्र्यं गाम्। ज्योक्  चिदत्र  तस्थिवांसो अक्रंचछत्रूयतामधरा  वेदनाक: ।।15।।3

अर्थ–स्वेच्छानुसार बहने वाले जलों से वृत्र बढ़ने लगा, तब इंद्र ने उसे अपने शक्ति साधनों से मार डाला। इंद्र ने भूमि की गूफा में सोए हुए वृत्र के गढ़ों का भेदन किया और उस सींग वाले को ताड़ना  दी। हे धनवान इंद्र! आपने बल वेग से शत्रु को नष्ट कर दिया। इंद्र के वज्र ने शत्रुओं को लक्ष्य कर तीक्ष्ण वर्षा के जल से उसके दुर्गों को छिन्न-भिन्न कर दिया। उन्हें वज्र से मारकर स्वयं उत्साहित हुए। हे इंद्र! आप जिस कुत्स को चाहते थे, उसकी रक्षा करते हुए दशायु नामक बैल को भी बचाया। अश्व के खुरों में धूल उड़कर आकाश तक फैल गई। तब भी आप रणक्षेत्र में खड़े रहे। हे इंद्र! भूमि की इच्छा से जल में गए हुए श्वेत्रेय की आपने रक्षा की। जल पर टिककर चिरकाल तक युद्ध करते रहे। शत्रुओं के ऐश्वर्य को आपने जल के नीचे पहुंचा दिया।


सूक्त-34

(ऋषि-हिरण्यस्तूप, अंगिरस। देवता-अश्विनी। छंद-जगती, त्रिष्टुप।)

त्रिश्चन् नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वां याम उत रातिरश्विना। युवोर्हि यंत्रं हिम्येव वाससो स्भ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभि:।।1
त्रय: पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद् विदु:। त्रय: स्कंभास: स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा।।2
समाने अहन् त्रिरवद्यगोहना त्रिरद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम्। त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम्।।3
त्रर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रि: सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षितम्। त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रि: पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम्।।4
त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवतातां त्रिरुतावतं धिय:। त्रि सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस् त्रिष्ठं वां सूरे दुहिता रुहद् रथम्।।5
त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रि: पार्थिवानि त्रिरु दत्तमभ्द्य:।।6।।4

अर्थ–मेधावी अश्विनी कुमारों! आप आज यहां तीन बार आइए। आपका मार्ग और दान दोनों विस्तृत हैं। ठंड में वस्त्रों के सहारे की तरह हमें आपका ही सहारा है। आप विद्वानों के माध्यम से हमें प्राप्त होइए। आपके मिष्ठान ढोने वाले रथ में तीन पहिए हैं। उसमें सहारे के लिए भी तीन खंभे लगे हुए हैं। देवताओं ने यह बात चंद्रमा के विवाह के समय जानी। हे अश्विनी कुमारों! आप उस रथ से रात्रि में तीन बार गमन करते हैं। हे दोष को ढकने वाले अश्विनी कुमारों! आप दिन में तीन बार, विशेषकर आज तीन बार यज्ञ को मधुर रस से सींचें और दिन रात में तीन बार हमारे लिए अन्न ला दें। हे कुमार द्वय! आप तीन बार मेरे घर आइए। आप तीन बार अपने अनुयायियों को सुरक्षित कीजिए। मुझे तीन बार सुखदायक पदार्थ और तीन बार दिव्य अन्न प्राप्त कराइए। हमें तीन बार धन दीजिए। हमारी वृत्तियों को तीन बार देवताओं की आराधना में प्रेरित कीजिए। मुझे तीन बार सौभाग्य और यश दीजिए। आपके रथ पर सूर्य पुत्री (ऊषा) सवार हैं। हे अश्विनी कुमारों! मुझे तीन बार रोगनाशक दिव्य औषधियां दीजिए। जल से तीन बार रोगों का नाश कीजिए। हमारी संतान की रक्षा कीजिए और सुख दीजिए। सब सुखों को तिगुने रूप में प्रदान कीजिए।


त्रिर्नो  अश्विना  यजता  दिवेदिवे  परि त्रिधातु  पृथिवीमशायतम्। तिस्रो  नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वात: स्वसराणि गच्छतम्।।7
त्रिरश्विना सिंधुभि: सप्तमातऋभिस् त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम्। तिस्र: पृथिवीरूपरि प्रवा  दिवो नाकं  रक्षेथे  द्युतिरक्तुभिर्हितम्।।8
क्व त्री चक्रा त्रिवृतो रथस्य  क्व  त्रयो वन्धुरो ये सनीला:। कदा योगो  वाजिनो   रासभस्य  येन  यज्ञं  नासत्योपयाथ:।।9
आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्व: पिबतं मधुपेभिरासभि:। युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवंतमिष्यति।।10
आ नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना। प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा।।11
आ नो अश्विना त्रिवृता रथेना स् र्वांचं रयिं वहतं सुवीरम्। शृण्वंता वामवसे जोहवीमि वृधे च नो भवतं वाजसातौ।।12।।5

अर्थ–हे अश्विद्वय! आप नित्य तीन बार पूजने योग्य हैं। आप पृथ्वी पर तीन बार तीन लपटों वाले कुशासन पर विराजमान होइए। हे असत्य रहित रथी! आत्मा द्वारा शरीरों को प्राप्त करने की तरह आप तीन यज्ञों को प्राप्त कराइए। हे अश्विद्वय! सप्त मातृ भूत जल द्वारा हमने तीन बार सोमों को सिद्ध किया है। यह तीन कलश भरकर हवि भी तैयार की है। आप आकाश के ऊपर चलते हुए तीनों लोकों की रक्षा करते हैं। हे अश्विद्वय! जिस रथ के द्वारा आप यज्ञ में आते हैं, उस त्रिकोण रथ के पहिए किधर लगे हैं? रथ के आधारभूत तीनों काष्ठ कहां हैं? आप के रथ में बलशाली गर्दभ कब संयुक्त किया जाएगा? हे अश्विद्वय! आइए मैं हव्य देता हूं। अत: मधुपान करने वाले सुखों से मधुर हवियों को ग्रहण कीजिए। ऊषाकाल से पूर्व आपके घृत युक्त रथ को यज्ञ में आने के लिए प्रेरणा देते हैं। हे असत्यरहित अश्वियों! आप तैंतीस देवताओं के साथ यहां आकर मधुपान कीजिए। हमें आयु देकर पापमुक्त कीजिए। शत्रुओं को भगाकर हमें वास दीजिए। हे अश्वियों! त्रिकोण रथ द्वारा वीरों से युक्त ऐश्वर्य को यहां लाइए। मैं आपका आह्वान करता हूं। आप युद्धों में हमारे बल में वृद्धि करें।



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